क्या भारतीय मंदिरों में दलितों को वास्तविक धार्मिक सत्ता मिल रही है?
तथ्यों के आधार पर एक निष्पक्ष विश्लेषण
प्रस्तावना: सवाल जो राजनीति को चुनौती देता है
जब एक पत्रकार ने बिहार के बेतिया में किसी मोदी समर्थक से पूछा — "क्या राम मंदिर में कभी कोई दलित मुख्य पुजारी होगा?" — तो वह युवक असहज हो गया। यह सवाल सिर्फ एक प्रश्न नहीं है; यह हिंदू समाज की गहरी विसंगति को उजागर करता है। आइए, भावनाओं से परे, तथ्यों के आधार पर समझते हैं।
भाग 1: द्वैध नीति का सवाल
चंदा तो लेते हैं, पुजारी नहीं बनाते
भारत के प्रमुख मंदिर बड़े आर्थिक साम्राज्य हैं। उदाहरण के लिए, तिरुपति बालाजी मंदिर ₹1,600 करोड़ वार्षिक चंदा एकत्रित करता है। इस धन का 60% दक्षिण भारत के ग्रामीण और निम्न-मध्यम वर्ग से आता है — जहां दलितों की संख्या अधिक है।
लेकिन नेतृत्व की बात आती है, तो तस्वीर बदल जाती है। तिरुपति, जगन्नाथ पुरी, वाराणसी, मथुरा — सभी बड़े मंदिरों में पुजारियां विशेषाधिकार प्राप्त ब्राह्मण परिवारों से आती हैं।
वर्तमान आँकड़े
- केरल: 1,000 से अधिक मंदिरों में दलित पुजारी शून्य
- उत्तर प्रदेश: अयोध्या के राम मंदिर में 50+ पुजारी — सभी ब्राह्मण
- कर्नाटक: 207 दलितों को प्रशिक्षण दिया गया, लेकिन किसी भी प्रमुख मंदिर में मुख्य पुजारी नहीं
- तमिलनाडु: 2024 तक 24 दलित पुजारी नियुक्त (केवल छोटे मंदिरों में)
भाग 2: राजनीति और वास्तविकता के बीच अंतराल
| राजनीतिक दावा | वास्तविकता |
|---|---|
| "सब हिंदू समान हैं" | मंदिरों में जाति-आधारित पुजारी चयन जारी |
| "संविधान हमारा मार्गदर्शक है" | अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता निषेध) को "धार्मिक स्वतंत्रता" के नाम पर नजरअंदाज किया जाता है |
| "दलित हिंदू समाज का अभिन्न हिस्सा" | भावनात्मक और आर्थिक शोषण किया जाता है, लेकिन सत्ता से वंचित रखा जाता है |
भाग 3: कानूनी और सामाजिक संदर्भ
आंबेडकर का आलोचनात्मक दृष्टिकोण
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1948 में कहा था: "हिंदू धर्म एक ढांचा है जहां दलितों को बाहर से चंदा देने की अनुमति है, परंतु अंदर प्रवेश की नहीं।"
आठ दशक बाद, यह कथन अभी भी प्रासंगिक है।
संवैधानिक ढांचा
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25(2) राज्य को धार्मिक संस्थानों में सुधार का अधिकार देता है। तमिलनाडु ने इसका उपयोग किया और दलित पुजारी प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए। लेकिन बहुसंख्य क्षेत्रों में, सरकारें परंपरा को संरक्षित रखने का चुनाव करती हैं।
भाग 4: सकारात्मक पहलें (लेकिन अपर्याप्त)
विश्व हिंदू परिषद (VHP) का दावा
VHP ने दावा किया है कि उन्होंने 5,000 दलितों को पुजारी बनाया है, विशेषकर दक्षिण भारत में। तमिलनाडु में 2,500 ऐसे प्रशिक्षण प्राप्त पुजारी कहे जाते हैं। हालांकि, ये अधिकांश कम-आय वाले क्षेत्रों के छोटे मंदिरों में नियुक्त हैं, मुख्य मंदिरों में नहीं।
केरल की CPI(M) सरकार का प्रयास
2017 में, केरल की सरकार ने 36 दलितों को पुजारी बनाया। यह एक ठोस कदम था, लेकिन सबरीमाला और अन्य बड़े मंदिरों से बहिष्कृत रहा।
भाग 5: मूल प्रश्न और निष्कर्ष
हिंदू राष्ट्र या ब्राह्मण राष्ट्र?
राजनीतिक नेतृत्व "हिंदू राष्ट्र" की घोषणा करता है, लेकिन मंदिरों की संरचना में कोई परिवर्तन नहीं। यह विसंगति सोची-समझी लगती है क्योंकि:
- दलित दान पर निर्भर हैं
- ब्राह्मण नेतृत्व बनाए रखना संभव है
- वोट और धार्मिक नियंत्रण दोनों सुरक्षित रहते हैं
संभावित समाधान
1. कानूनी हस्तक्षेप: सरकार-संचालित मंदिरों में दलित पुजारियों की अनिवार्य प्रतिनियुक्ति (तमिलनाडु मॉडल)।
2. ट्रस्ट सुधार: मंदिर प्रबंधन में दलितों का प्रतिनिधित्व।
3. सांस्कृतिक पुनर्विचार: कबीर, रविदास और नारायण गुरु की परंपरा को पुनः स्थापित करना, जिन्होंने जाति-आधारित पुजारीकरण का विरोध किया।
अंतिम शब्द
"जब तक मंदिर का मुख्य पुजारी दलित नहीं बनता, 'हिंदू राष्ट्र' की अवधारणा एक चुनावी नारा बनी रहेगी, न कि सामाजिक वास्तविकता।"
भारत को अपने संवैधानिक मूल्यों और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच चुनाव करना होगा। इस बार, न्याय तराजू का दूसरा पलड़ा भारी होना चाहिए।

0 Comments