सोशल मीडिया पर कभी-कभी ऐसे वाक्य दिख जाते हैं जो इतिहास को एक अजीबो-गरीब मोड़ देकर पेश करते हैं। कुछ दिनों से एक पोस्ट चर्चा में है:
“अंग्रेज़ों के दल्ले पर अब खुल कर लोग सवाल करने लगे हैं, कड़ुते तर्कों से लताड़ रहे हैं! पूछ रहे हैं: हे भीमतो तुम्हारा बाप जब शिक्षा नामक शेरनी का दूध पिया तो अंग्रेज़ों के सामने दहाड़ने की बजाय म्याऊं‑म्याऊँ क्यों करता रहा?”
पढ़कर हैरानी होती है – एक तो भाषा अपमानजनक है, दूसरे इसमें इतिहास के साथ छेड़छाड़ की गई लगती है। आइए, इस पूरे विवाद को समझने की कोशिश करते हैं और देखते हैं कि तथ्य क्या कहते हैं।
यह दावा आखिर कहाँ से आया?
सबसे पहले तो यह जानना ज़रूरी है कि यह वाक्य है क्या। हमने इसकी गहन पड़ताल की और पाया कि:
- कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं: यह वाक्य किसी भी प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ, भाषण, समाचार या आज़ादी के दौर के दस्तावेज़ में नहीं मिलता।
- भाषा काल्पनिक है: “शिक्षा नामक शेरनी”, “भीमतो”, “म्याऊँ-म्याऊँ” जैसे शब्दों का प्रयोग किसी गंभीर राजनीतिक टिप्पणी में नहीं होता। ये शब्द साफ़ तौर पर एक मज़ाकिया या व्यंग्यात्मक पोस्ट की ओर इशारा करते हैं।
- स्रोत सोशल मीडिया है: यह मुख्य रूप से सोशल मीडिया पर एक 'मीम' या 'वायरल पोस्ट' के रूप में फैला है, न कि किसी ऐतिहासिक स्रोत से।
सीधी बात यह है कि यह दावा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है, बल्कि एक आधुनिक, काल्पनिक रचना लगती है जिसे भड़काऊ ढंग से बनाया गया है।
लेकिन इस पोस्ट के पीछे जो आरोप छिपा है, वह पुराना है – कि डॉ. अंबेडकर ने अंग्रेज़ों के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई। आइए, इसी आरोप की सच्चाई जानने की कोशिश करें।
डॉ. अंबेडकर की शिक्षा: "शेरनी का दूध" या संघर्ष का हथियार?
दावे में कहा गया है कि अंबेडकर ने "शिक्षा नामक शेरनी का दूध पिया"। उनकी शिक्षा के बारे में तथ्य ये हैं:
- उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (ब्रिटेन) से अर्थशास्त्र, कानून और राजनीति विज्ञान में डिग्रियाँ हासिल कीं।
- यह शिक्षा बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति से मिली थी, न कि अंग्रेज़ सरकार की कोई मेहरबानी से।
- उनका मकसद साफ़ था: विदेश में जाकर ज्ञान अर्जित करना और वापस आकर समाज के सबसे दबे-कुचले वर्गों के लिए लड़ाई लड़ना। उनके अपने शब्दों में, यह शिक्षा "समाजिक न्याय के लिए एक हथियार" थी।
तो, शिक्षा उनके लिए "शेरनी का दूध" नहीं, बल्कि असली शेर बनने का रास्ता थी – एक ऐसा शेर जिसने जाति व्यवस्था और शोषण के खिलाफ इतिहास की सबसे मज़बूत दहाड़ दर्ज की।
सवाल: क्या अंबेडकर अंग्रेज़ों के सामने "म्याऊँ-म्याऊँ" करते रहे?
यह आरोप बिल्कुल गलत और ऐतिहासिक सत्य को तोड़-मरोड़कर पेश करता है। आइए, तथ्यों से इसे समझते हैं:
1. अंग्रेज़ी शासन के प्रति उनका रवैया
डॉ. अंबेडकर कभी भी अंग्रेज़ों के "अनुयायी" या "समर्थक" नहीं थे। वे एक रणनीतिक विचारक थे। उनका एकमात्र लक्ष्य दलितों के अधिकारों की रक्षा करना था।
- उनका मानना था कि उस समय ब्रिटिश शासन दलितों को कुछ कानूनी सुरक्षा दे रहा था, जबकि भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन पर ऊंची जातियों का दबदबा था, जो दलित हितों की अनदेखी कर सकता था।
- उन्होंने 1930-40 के दशक में दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की माँग रखी, जिसे ब्रिटिश सरकार ने सैद्धांतिक समर्थन दिया। लेकिन महात्मा गांधी के विरोध के बाद यह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा (यही पूना समझौता, 1932 की पृष्ठभूमि है)।
- 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' का उन्होंने विरोध किया, क्योंकि उन्हें डर था कि अचानक स्वतंत्रता मिलने पर दलितों के हितों को दरकिनार कर दिया जाएगा।
2. ब्रिटिश प्रशासन के साथ काम करने का मतलब
1942 से 1946 तक, उन्होंने वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम मंत्री के रूप में काम किया। इसे कई लोग "अंग्रेज़ों के साथ सहयोग" कहते हैं, लेकिन सच यह है:
- यह पद उनके लिए एक रणनीतिक मंच था। इसी पद पर रहते हुए उन्होंने कारखाना अधिनियम जैसे कानूनों में सुधार किए, जिससे हज़ारों दलित और श्रमिक शोषण से बच सके।
- उनका दर्शन साफ़ था: "संवैधानिक और कानूनी रास्तों से लड़ाई लड़ो।" वे मानते थे कि सड़कों पर केवल नारेबाज़ी से अधिकार नहीं मिलते, बल्कि कानूनी ढांचे में बदलाव लाना ज़रूरी है।
क्या यह "म्याऊँ-म्याऊँ" करना था? बिल्कुल नहीं। यह एक सोची-समझी रणनीति थी ताकि दलित समाज को राजनीतिक और कानूनी ताकत मिल सके।
सबसे बड़ा सबूत: भारत का संविधान
डॉ. अंबेडकर की दूरदर्शिता और प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा प्रमाण हमारा संविधान है। स्वतंत्र भारत में, उन्होंने संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में वह ऐतिहासिक दस्तावेज़ तैय्यार किया, जो समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की गारंटी देता है।
- संविधान में अस्पृश्यता का उन्मूलन, सभी को समान अधिकार और सामाजिक अन्याय के खिलाफ सुरक्षा के प्रावधान सीधे तौर पर डॉ. अंबेडकर के संघर्ष और दर्शन की देन हैं।
- क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो अंग्रेज़ों का "दलाल" हो, देश के लिए इतना प्रगतिशील और न्यायपूर्ण संविधान लिख सकता था? यह सवाल अपने आप में उस भ्रामक दावे का जवाब है।
निष्कर्ष: इतिहास को समग्रता में देखने की ज़रूरत
- दावा भ्रामक है: "शेरनी का दूध" और "म्याऊँ-म्याऊँ" वाला वाक्य एक काल्पनिक रचना है, जिसका ऐतिहासिक आधार नहीं है। यह सोशल मीडिया पर भड़काऊ सामग्री फैलाने का एक तरीका लगता है।
- अंबेडकर का रुख रणनीतिक था: उन्होंने अंग्रेज़ों का "विरोध" या "समर्थन" करने की बजाय, दलितों के अधिकारों को सुरक्षित करने को अपनी लड़ाई का केंद्र बनाया। उनकी हर कार्रवाई इसी रणनीति का हिस्सा थी।
- उनकी विरासत अमर है: आज हम जिस संवैधानिक लोकतंत्र, समानता के अधिकार और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, उसकी नींव में डॉ. अंबेडकर का अथक संघर्ष और दूरदर्शी सोच शामिल है।
इतिहास के किसी भी व्यक्तित्व को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम उनके फैसलों को उस ऐतिहासिक संदर्भ में देखें, जिसमें वे काम कर रहे थे। डॉ. अंबेडकर पर लगे इस आरोप से हमें एक बड़ी सीख मिलती है: सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हर बात को बिना जाँच-परखे स्वीकार न करें, खासकर जब वह इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश कर रही हो।
आखिर में, एक सवाल हम सबसे: क्या हम उस व्यक्ति को "म्याऊँ-म्याऊँ" करने वाला कह सकते हैं, जिसने करोड़ों लोगों की आवाज़ को दहाड़ बनाकर एक पूरे संविधान में गूंजने दिया?
सन्दर्भ स्रोत: अंबेडकर के लेखन, पूना समझौता (1932) के दस्तावेज़, धनंजय कीर की जीवनी "डॉ. अंबेडकर: लाइफ एंड मिशन", तथा रामचंद्र गुहा की "इंडिया आफ्टर गांधी"।

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