आज सोशल मीडिया पर पेशवा शासन को लेकर दो बिल्कुल अलग-अलग तस्वीरें दिखती हैं।
एक तरफ – “हिंदवी स्वराज के वीर रक्षक”,
दूसरी तरफ – “ब्राह्मणवादी, जातिवादी और दलित–बहुजन विरोधी सत्ता”।
आपके द्वारा शेयर किए गए थ्रेड में पेशवाओं की कड़ी आलोचना की गई है।
इस लेख में हम उन्हीं दावों को इतिहासकारों और मूल स्रोतों के आधार पर जाँचते हैं –
ताकि भावनाओं से नहीं, तथ्यों से बात हो।
1. पेशवा शासन और जातिवाद: क्या जातिवाद सचमुच चरम पर था?
दावा:
पेशवा काल में जाति व्यवस्था बेहद कठोर थी, और शासन ब्राह्मणवादी दृष्टि से चलता था।
इतिहास क्या कहता है?
- पेशवा मुख्यतः चितपावन ब्राह्मण थे और 18वीं–19वीं सदी तक प्रशासन, न्याय और धर्म के कई नियमों में धर्मशास्त्र (जैसे मनुस्मृति आदि) का मजबूत प्रभाव दिखता है।
- कई इतिहासकार मानते हैं कि शिवाजी के समय की अपेक्षाकृत व्यावहारिक और समावेशी नीतियाँ बाद के पेशवा काल में संकुचित और ब्राह्मण–प्रधान हो गईं।
- गोविंद पानसरे ने “शिवाजी कौन होता?” में विस्तार से लिखा है कि शिवाजी की विरासत को बाद के ब्राह्मण शासकों ने अपने पक्ष में धर्मशास्त्रीय रंग देकर बदला और सत्ता का केंद्रीकरण पेशवाओं के हाथ में हो गया।
आकलन:
- यह बात स्वीकार की जाती है कि पेशवा काल में जाति व्यवस्था कठोर हुई, विशेषकर निचली जातियों और अछूत माने जाने वाले समुदायों के लिए।
- आलोचकों द्वारा इसे “ब्राह्मणवादी तानाशाही” कहना एक राजनीतिक/वैचारिक भाषा है, लेकिन इसकी जड़ें वास्तविक सामाजिक असमानताओं में हैं, जिन्हें कई विद्वान स्वीकार करते हैं।
2. दलितों पर प्रतिबंध: गले में हांडी, कमर में झाड़ू?
दावा:
पुणे में पेशवाओं के शासन के दौरान दलितों पर अमानवीय प्रतिबंध थे –
जैसे अछूतों को
- गले में हांडी बाँधना,
- कमर में झाड़ू बाँधना,
- घोड़े पर न चढ़ने देना,
- हथियार और शिक्षा से वंचित रखना।
इतिहास क्या कहता है?
- डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपनी कई रचनाओं में पेशवा शासन के समय पुणे क्षेत्र में दलितों की भयावह स्थिति का उल्लेख किया है। वे लिखते हैं कि पेशवा काल में अछूतों की हालत इतनी बुरी थी कि उनका इंसानी गरिमा से कोई संबंध नहीं बचा था।
- दलित इतिहास पर काम करने वाली विद्वान एलेनॉर ज़ेलियट ने भी महार समुदाय और अन्य दलित समूहों पर लगे सामाजिक प्रतिबंधों का वर्णन किया है, विशेषकर गाँवों और कस्बों के सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में।
- जीवनी लेखक धनंजय कीर, जिन्होंने “डॉ. अंबेडकर: लाइफ़ ऐंड मिशन” लिखी, वे भी पेशवा-युग में दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार का उल्लेख करते हैं।
महत्वपूर्ण बात:
- “गले में हांडी और कमर में झाड़ू” जैसी घटनाएँ मुख्य रूप से पुणे और उसके आसपास के लिए दर्ज हैं; यह कहना कि पूरा भारतीय उपमहाद्वीप हर जगह बिल्कुल यही नियम मानता था, ऐतिहासिक रूप से अतिशयोक्ति होगी।
- लेकिन यह तथ्य भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि अछूतों के साथ अत्यंत अपमानजनक व्यवहार होता था, और पेशवा सत्ता ने उसे न केवल सहन किया बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बनाए रखा।
आकलन:
- दावा मूलतः सही है, हालांकि इसे पूरे साम्राज्य पर एक समान रूप से लागू मानना थोड़ा सरलीकरण होगा।
- फिर भी दलित–बहुजन परिप्रेक्ष्य से पेशवा शासन को दमनकारी मानने के ठोस ऐतिहासिक कारण मौजूद हैं।
3. पेशवा शासन में महिलाओं की स्थिति
दावा:
पेशवा शासन में
- सती प्रथा को संरक्षण,
- विधवा पुनर्विवाह पर रोक,
- बाल विवाह को बढ़ावा,
- और महिलाओं पर कड़े सामाजिक नियंत्रण थे।
इतिहास क्या कहता है?
- 18वीं–19वीं सदी का अधिकांश उच्चवर्णीय हिंदू समाज पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी था।
- इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने “Gendering Caste: Through a Feminist Lens” में दिखाया है कि जाति व्यवस्था और पितृसत्ता साथ मिलकर विशेषकर ऊँची जातियों की स्त्रियों के जीवन को नियंत्रित करते थे – जैसे कठोर शील–संहिता, शिक्षा से वंचित रखना, विधवा जीवन पर सख्त नियम आदि।
- सती प्रथा और बाल विवाह केवल पेशवाओं की “खोज” नहीं थे; ये कई क्षेत्रों में चलन में थे। परन्तु पेशवा जैसे शक्तिशाली शासकों ने इन प्रथाओं को कानूनी-सामाजिक संरक्षण देकर मजबूत ही किया, चुनौती नहीं दी।
- विधवा पुनर्विवाह पर सामाजिक प्रतिबंध विशेषकर ब्राह्मण और उच्च जाति समाज में अत्यंत कठोर थे; यह स्थिति 19वीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलनों तक बनी रही।
आकलन:
- यह सही है कि पेशवा शासन महिलाओं के अधिकारों के मामले में प्रगतिशील नहीं था; वह उस समय के रूढ़िवादी ब्राह्मणवादी ढांचे के भीतर ही काम करता था।
- लेकिन जो समस्याएं थीं, वे लगभग पूरे ऊँची जाति–केन्द्रित हिंदू समाज में मौजूद थीं; पेशवाओं ने उनमें सुधार करने के बजाय उन्हीं को संरक्षित रखा।
4. पेशवाओं और अंग्रेजों के रिश्ते: सिर्फ़ विरोध या समझौते भी?
दावा:
पेशवाओं ने अंग्रेजों से कभी समझौता नहीं किया – यह झूठ है; उन्होंने संधियाँ कीं, पेंशन ली और सैन्य मदद भी ली।
इतिहास क्या कहता है?
- 18वीं–19वीं सदी में मराठा शक्ति और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संबंध बहुत जटिल थे – कभी युद्ध, कभी संधि।
- सबसे अहम घटना बेसीन की संधि (Treaty of Bassein), 1802 है:
- पेशवा बाजीराव द्वितीय आंतरिक संघर्षों और होलकरों से हार के बाद अंग्रेजों की शरण में गए।
- इस संधि के तहत उन्होंने अंग्रेजों से सुरक्षा के बदले में उनकी शर्तें मानीं और व्यावहारिक रूप से मराठा स्वतंत्रता को कमजोर किया।
- इतिहासकार जदुनाथ सरकार और सुमित सरकार दोनों इस संधि को मराठा शक्ति के पतन का निर्णायक मोड़ मानते हैं।
- इसके बाद अंग्रेजों ने मराठा क्षेत्रों में खुलकर हस्तक्षेप करना शुरू किया; कई मराठा सरदार और पेशवा गुट कभी अंग्रेजों के साथ, कभी उनके खिलाफ खड़े दिखते हैं।
आकलन:
- “पेशवाओं ने अंग्रेजों से कभी समझौता नहीं किया” – यह दावा स्पष्ट रूप से गलत है।
- सही तस्वीर यह है कि:
- उन्होंने अंग्रेजों से कई संधियाँ कीं,
- कई बार सैन्य मदद ली,
- और अंततः पेशवा बाजीराव द्वितीय ने पराजय के बाद ब्रिटिश पेंशन पर जीवन बिताया।
- साथ ही यह भी सच है कि कई बार मराठा बलों ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध भी किए। दोनों बातें साथ–साथ मौजूद हैं।
5. भीमा-कोरेगांव की लड़ाई: 500 महार बनाम 28,000 पेशवा?
दावा:
1818 में भीमा–कोरेगांव में लगभग 500 महार सैनिकों ने 28,000 पेशवा सैनिकों को पराजित किया। यह जातिवादी पेशवा सत्ता के पतन का प्रतीक है।
तथ्यात्मक स्थिति क्या है?
- तारीख़:
- यह लड़ाई 1 जनवरी 1818 को भीमा नदी के किनारे, कोरेगांव गाँव के पास हुई।
- सेनाओं की संख्या:
- ब्रिटिश पक्ष:
- ईस्ट इंडिया कंपनी की एक छोटी टुकड़ी, जिसमें बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री की टुकड़ी और कुछ घुड़सवार व तोपची शामिल थे।
- कुल सैनिक संख्या लगभग 800–900 के आसपास मानी जाती है।
- पैदल सेना में एक बड़ी संख्या महार समुदाय के सैनिकों की थी।
- पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना:
- कुल सैन्य बल का अनुमान 20,000 से 28,000 के बीच रखा जाता है।
- लेकिन पूरी सेना ने एक साथ और पूरे बल से इस छोटी टुकड़ी पर आक्रमण नहीं किया; लड़ाई में वास्तव में संलग्न सैनिकों की संख्या इस कुल संख्या से कम थी।
- ब्रिटिश पक्ष:
- परिणाम:
- ब्रिटिश–महार टुकड़ी ने काफी भारी नुकसान उठाते हुए भी अपना मोर्चा नहीं छोड़ा।
- पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना निर्णायक जीत हासिल नहीं कर पाई और अंततः पीछे हट गई, क्योंकि ब्रिटिश रिइनफोर्समेंट (जनरल स्मिथ की सेना) के पहुँचने का खतरा उत्पन्न हो गया था।
- प्रतीकात्मक महत्व:
- दलित इतिहासकारों और कार्यकर्ताओं के लिए यह घटना सिर्फ़ एक सैन्य झड़प नहीं बल्कि दलित सैनिकों द्वारा उस शासन के खिलाफ लड़ाई है, जिसने उन्हें सामाजिक रूप से अछूत माना था।
- एलेनॉर ज़ेलियट और अन्य शोधकर्ताओं ने दिखाया है कि डॉ. आंबेडकर के हस्तक्षेप के बाद 20वीं सदी में भीमा–कोरेगांव दलित स्वाभिमान का प्रमुख प्रतीक बन गया।
आकलन:
- “500 बनाम 28,000” वाला आंकड़ा प्रतीकात्मक और सरलीकृत है; वास्तविक संख्याएँ इससे थोड़ी अलग और अधिक जटिल हैं।
- फिर भी, कमज़ोर संख्या वाली दलित–बहुल टुकड़ी का पेशवा सेना को रोक लेना और पीछे हटने पर मजबूर करना – यह ऐतिहासिक रूप से सही और महत्वपूर्ण है।
- दलित परिप्रेक्ष्य से इसे जातिवादी सत्ता पर प्रतीकात्मक जीत के रूप में देखना समझ में आता है, भले ही सैन्य इतिहास की भाषा इससे थोड़ी अलग हो।
6. डॉ. आंबेडकर की दृष्टि: पेशवा राज और भीमा-कोरेगांव
दावा:
डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने पेशवा शासन को ब्राह्मणवादी तानाशाही कहा और बहुजनों के लिए नरक बताया।
इतिहास क्या कहता है?
- डॉ. आंबेडकर ने अपनी प्रसिद्ध रचना “Annihilation of Caste” और अन्य लेखों में बार–बार यह कहा कि:
- पेशवा शासन में मनुस्मृति जैसे ग्रंथों पर आधारित कानून और सामाजिक नियम दलितों के लिए नरक जैसे थे।
- वे पेशवा शासन को ब्राह्मणवादी सामाजिक तानाशाही की मिसाल के रूप में पेश करते हैं, जहाँ अछूतों के साथ अत्यधिक अमानवीय व्यवहार होता था।
- डॉ. आंबेडकर ने खुद भीमा–कोरेगांव का स्मारक (obelisk) देखा और इस लड़ाई को दलितों के आत्मसम्मान और प्रतिरोध का प्रतीक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- एलेनॉर ज़ेलियट ने दिखाया है कि 1927 के बाद विशेष रूप से आंबेडकर के नेतृत्व में दलित समुदाय ने 1 जनवरी को भीमा–कोरेगांव जाकर शहादत को याद करना शुरू किया, जो आज तक जारी है।
आकलन:
- डॉ. आंबेडकर का मत पेशवा शासन के प्रति अत्यंत आलोचनात्मक और कठोर है – और यह उनकी वैचारिक राजनीति के केंद्र में है।
- उनके लिए पेशवा राज “स्वर्णिम मराठा काल” नहीं, बल्कि दलितों के लिए त्रासदीपूर्ण दौर था।
7. समग्र निष्कर्ष: कौन से दावे सही हैं, कहाँ पर अतिशयोक्ति है?
अब संक्षेप में देखें कि आपके मूल थ्रेड के दावे तथ्य की कसौटी पर कहाँ टिकते हैं:
-
पेशवा शासन में जातिवाद चरम पर था
- ✔️ बड़ी हद तक सही
- जाति व्यवस्था कठोर थी; चितपावन ब्राह्मण पेशवा, धर्मशास्त्र आधारित नियम, दलित–बहुजन पर भारी दमन – यह सब विविध स्रोतों से पुष्ट होता है।
-
दलितों पर अमानवीय प्रतिबंध (गले में हांडी, कमर में झाड़ू आदि)
- ✔️ मूलतः सही, पर क्षेत्रीय रूप से सीमित
- ऐसे वर्णन पुणे और आसपास जैसे क्षेत्रों के लिए दर्ज हैं; इन्हें पूरे भारत पर एक समान लागू मानना उपयुक्त नहीं, लेकिन दमन की गंभीरता को कम करके भी नहीं देखा जा सकता।
-
महिलाओं की स्थिति – सती, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषिद्ध
- ✔️ प्रसंग सहित सही
- यह पूरा ऊँची जाति–केन्द्रित हिंदू समाज की व्यापक समस्या थी। पेशवाओं ने इसे चुनौती नहीं दी, बल्कि संरक्षण दिया; वे इस रूढ़िवादी ढाँचे का हिस्सा थे।
-
पेशवाओं का अंग्रेजों से समझौता, पेंशन और सैन्य सहायता
- ✔️ पूरी तरह सही
- बेसीन की संधि (1802) और बाद के घटनाक्रम दिखाते हैं कि पेशवा बाजीराव द्वितीय ने सत्ता बचाने के लिए अंग्रेजों से स्पष्ट समझौते किए। “कभी समझौता नहीं किया” वाला राष्ट्रवादी दावा इतिहास से मेल नहीं खाता।
-
भीमा–कोरेगांव में महार सैनिकों की जीत और पेशवा सत्ता का प्रतीकात्मक अंत
- ✔️ मूलतः सही, संख्याओं में थोड़ी अतिशयोक्ति
- 500 बनाम 28,000 वाला नारा सांकेतिक है; वास्तविक संख्या थोड़ी भिन्न है। लेकिन यह लड़ाई पेशवा सत्ता के पतन की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव और दलितों के लिए स्वाभिमान का प्रतीक ज़रूर बनी।
-
डॉ. आंबेडकर का मत: पेशवा शासन = बहुजनों के लिए नरक
- ✔️ स्रोत–समर्थित और स्पष्ट
- आंबेडकर के लेखन और भाषणों से यह दृष्टि साफ़–साफ़ सामने आती है।
8. “राष्ट्रवादी इतिहास” बनाम “बहुजन इतिहास”
अंत में, यह समझना ज़रूरी है कि:
-
मुख्यधारा राष्ट्रवादी इतिहास प्रायः मराठा–पेशवा शासन को
- “विदेशी मुग़लों और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले वीर”
के रूप में महिमामंडित करता है।
- “विदेशी मुग़लों और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले वीर”
-
जबकि दलित–बहुजन दृष्टिकोण पूछता है:
- “उस सत्ता के नीचे दलितों, ओबीसी, किसानों, महिलाओं की क्या स्थिति थी?”
इसी टकराव में भीमा–कोरेगांव जैसी घटनाएँ बहुजन स्मृति में स्वतंत्रता और प्रतिरोध के प्रतीक बन जाती हैं, जबकि कुछ राष्ट्रवादी लेखन उन्हें केवल “ब्रिटिश की लड़ाई” कहकर कमतर आँकने की कोशिश करते हैं।
तथ्य यह है कि:
- पेशवाओं ने कभी–कभी अंग्रेजों से डटकर युद्ध भी किया,
- और कई मौके पर उन्हीं अंग्रेजों से समझौते भी किए।
- उन्होंने मुसलमान साम्राज्यों से भी लड़ा,
- और अपने ही समाज के निचले तबकों पर कठोर दमन भी किया।
यानी, इतिहास न तो पूरी तरह “महिमामंडित” करने लायक है, न ही सिर्फ़ एक शब्द “कलंक” में समेटने लायक।
सबसे ज़रूरी है – सत्ता के हर रूप को दलित–बहुजन, स्त्री और आम जनता की नज़र से भी देखना, जैसा कि आंबेडकर, पानसरे, ज़ेलियट, उमा चक्रवर्ती और अनेक इतिहासकार हमें सिखाते हैं।
संदर्भ (References)
- गोविंद पानसरे, शिवाजी कौन होता?
- B.R. Ambedkar, Annihilation of Caste और अन्य लेखन।
- Eleanor Zelliot, From Untouchable to Dalit: Essays on the Ambedkar Movement.
- Dhananjay Keer, Dr. Ambedkar: Life and Mission.
- Uma Chakravarti, Gendering Caste: Through a Feminist Lens.
- Jadunath Sarkar, Fall of the Mughal Empire (Vol. 2).
- Sumit Sarkar, Modern India 1885–1947.



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