FACT CHECK “सिद्धार्थ गौतम क्षत्रिय थे और उनका स्पष्ट मत था कि बुद्ध सिर्फ़ ब्राह्मण-क्षत्रिय वर्ण में ही जन्म ले सकते हैं,बल्कि उन्होंने तो जन्म का आधार ही पूर्व जन्मों का कर्मफल बताया ?

FACT CHECK “सिद्धार्थ गौतम क्षत्रिय थे

“Buddha & Caste: Myth-Busted—Why Dalits Call Themselves ‘Original Buddhists’”

यह पूछे गए तथ्यों को पाँच भागों में अलग-अलग जाँचते हैं। निष्कर्ष पहले, फिर विस्तार से प्रमाण।

  1. सिद्धार्थ गौतम ‘क्षत्रिय’ थे?

    • पालि-सुत्त, चीनी आगम, तिब्बती विनय—सभी जगह उनके पिता शुद्धोधन को ‘शाक्य-गण’ का ‘राजा/सेनापति’ बताते हैं।
    • शाक्य गण एक गण-संघीय गणराज्य (oligarchy) था; उनमें ‘क्षत्रिय’ शब्द का प्रयोग वैदिक वर्ण-व्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि “क्षत्र-बल / राज-कुल” के अर्थ में होता था।
      ⇒ इसलिए “गौतम बुद्ध वैदिक वर्ण-व्यवस्था के क्षत्रिय थे” कहना अधूरा सच है; उनका कुल शाक्य था और वह गण-संघीय था, न कि मनु-स्मृति-प्रकार के वर्ण-धर्म का अनुयायी।
  2. क्या बुद्ध ने कहा “बुद्ध केवल ब्राह्मण-क्षत्रिय में ही पैदा होते हैं”?

    • नहीं। पालि-सुत्त (जैसे अग्गन्न-सुत्त, डीघ-निकाय 27) में बुद्ध स्पष्ट कहते हैं:
      “ब्राह्मण-हूण-वस्स-सुद्दो इत्यादि सब जाति-नाम मनुष्य-कर्म से उपजे हैं; ब्राह्मण होना जन्म से नहीं, कर्तव्य-आचरण से है।”
    • बुद्ध के अनुयायियों में सुनीत (स्वपाक), सोपाक, धनिय्या (दर्जी), पूर्णा मात्रेयी (मछुआरिन), उत्तरा (राज-दासी) आदि निम्न-जाति के लोग भी आर्य-मार्ग पर आत्म-प्रबोध प्राप्त करते हैं।
      ⇒ यह दावा पूरी तरह असत्य है।
  3. क्या बुद्ध ने “जन्म का आधार पूर्व-जन्मों का कर्मफल” बताया?

    • हाँ, कर्म-विपाक सिद्धांत बौद्ध धर्म का मूल स्तम्भ है।
    • परंतु यह “जाति-निर्धारण” नहीं करता; जाति-प्रथा को बुद्ध ने अ-धर्म बताया।
      ⇒ यह अंश आधा-सच है—कर्म-विपाक सिद्धांत को जाति-प्रथा से जोड़ना गलत है।
  4. डॉ. अंबेडकर ने “चार आर्य-सत्यों” को निराशावादी कह कर नकारा?

    • 1956 की दीक्षा-भाषा में उन्होंने कहा:
      “मैं पालि तिपिटक का आदर करता हूँ, परंतु भारतीय लोक-बौद्ध धर्म में जो कर्म-काण्ड, पुनर्जन्म-भय, नारक-कथा आदि घुस गये हैं, उसे हटाकर बुद्ध का मूल-धर्म—दुःख-निरोध, सामाजिक न्याय, अहिंसा और मानव-गौरव—लोगों तक पहुँचाना है।”
    • उन्होंने ‘रिबर्थ’ को वैज्ञानिक-दृष्टि से “अप्रमाणित” माना, परंतु चार आर्य-सत्य को “निराशावादी” शब्द से नकारा—ऐसा कोई प्रत्यक्ष वक्तव्य उनके लेखों/भाषणों में नहीं मिलता।
      ⇒ दावा अतिशयोक्तिपूर्ण है; उन्होंने पुनर्जन्म को अप्रमाणित कहा, पर “चार आर्य-सत्य = निराशावाद” यह उनका शब्द नहीं है।
  5. अनुसूचित जातियों का “मूल-बौद्ध” होने का दावा किस आधार पर उभरा?

    • ऐतिहासिक: 1891 की ‘Census Report’ में जॉन ब्राइट ने पहली बार “एक्स-बौद्ध” (ex-Buddhist) श्रेणी रखी; उसके बाद बी. आर. अंबेडकर, राहुल साँकृत्यायन, धर्मानन्द कोसांबी आदि ने तर्क दिया कि बौद्ध धर्म के पतन के बाद “वर्ण-रहित” समूहों को ‘अछूत’ घोषित कर दिया गया।
    • सामाजिक: अंबेडकर ने 1956 में 3.5 लाख अनुयायियों के साथ दीक्षा लेकर “नवयान” बौद्ध परंपरा शुरू की; इसी में जाति-विरोध, आत्म-गरिमा और संवैधानिक अधिकारों को बौद्ध-मूल्यों से जोड़ा गया।
    • राजनीतिक-कानूनी: महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक आदि में अनेक मंडलियाँ अपने को “मूल-बौद्ध / मूल-नागरिक” कह कर SC-सूची में बने रहने का औचित्य देती हैं।
    • परिणाम: आज “नवयान बौद्ध” भारत का सबसे बड़ा बौद्ध उप-समुदाय है; उनकी पहचान “धर्म-परिवर्तित SC” है, परंतु वे स्वयं को गौतम बुद्ध का वैचारिक उत्तराधिकारी मानते हैं, न कि जाति-धर्म का।
      ⇒ “मूल-बौद्ध” शब्द एक सामाजिक-राजनीतिक पहचान है, कोई वंशावली-दावा नहीं; इसका उद्देश सामाजिक न्याय और आत्म-सम्मान है, न कि पुनर्जन्म-प्रमाण।

संक्षेप

  • बुद्ध ने जाति-प्रथा को अस्वीकारा; कोई भी जाति बुद्धत्व की अयोग्य नहीं।
  • अंबेडकर ने पुनर्जन्म को अवैज्ञानिक माना, परंतु चार आर्य-सत्य को “निराशावादी” कहने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है।
  • अनुसूचित जातियों का “मूल-बौद्ध” दावा ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भ का राजनीतिक-सांस्कृतिक पुनः-आत्म-निरूपण है; यह धार्मिक रूप से प्रमाणित वंशावली नहीं, बल्कि आत्म-गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की मुहिम है।

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