इतिहास में बहुत लंबे समय तक “नीची जातियों” (शूद्र, अतिशूद्र/अस्पृश्य, दलित आदि) के लिए पढ़ना‑लिखना सामाजिक रूप से प्रतिबंधित और दण्डनीय था – पर इसे समझने के लिए दो चीजें अलग‑अलग देखनी पड़ती हैं:
- धार्मिक/शास्त्रीय आदर्श (ग्रंथों में क्या लिखा है)
- वास्तविक सामाजिक‑इतिहास (जमीन पर क्या होता रहा)
आपका वाक्य भावनात्मक रूप से तीखा है, लेकिन उसका मूल दावा – कि शूद्रों/दलितों का शिक्षा पर अधिकार नकारा गया – ऐतिहासिक रूप से काफी हद तक सही है, बस उसे थोड़ी बारीकी से समझना चाहिए।
1. शास्त्रों में क्या मिलता है?
(क) वेदाध्ययन पर प्रतिबंध
कई धर्मसूत्रों और स्मृतियों में “वेद” सीखने का अधिकार मूलतः “द्विज” (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) तक सीमित बताया गया है।
शूद्र के लिए वेद सुनना‑पढ़ना निषिद्ध कहा गया:
- कुछ ग्रंथों में लिखा है कि
- यदि शूद्र वेद सुने तो उसके कान में पिघला सीसा/टिन डालने जैसी कठोर सज़ा (ये उदाहरण आज भी बहस में बहुत उद्धृत होते हैं)।
- यानी “शूद्र का वेदाधिकार नहीं” – यह बात कई पारंपरिक व्याख्याओं में स्पष्ट रूप से कही गई।
यह बात ज़रूरी है:
शास्त्रीय रूप से “निषेध” मुख्य रूप से “वेदाध्ययन” और ब्राह्मणों के धर्मशिक्षा पर है।
अब व्यवहार में यही मानसिकता आगे चलकर सामान्य शिक्षा के निषेध में बदल गई।
(ख) “दलित” शब्द ऐतिहासिक रूप से नया
- प्राचीन ग्रंथों में “दलित” शब्द वैसा नहीं मिलता जैसा आज की राजनीति‑समाजशास्त्र में है।
- वहां “अवर्ण”, “चांडाल”, “अस्पृश्य” जैसी श्रेणियाँ मिलती हैं, जिन्हें आज मोटे तौर पर “दलित” कहा जाता है।
- इन पर तो वेद क्या, मंदिर, कुएँ, बस्तियाँ, सार्वजनिक स्थानों तक में प्रवेश निषेध जैसी बातें परंपराओं में मिलती हैं।
इसलिए वाक्य में “दलितों और शूद्रों को कभी पढ़ने का अधिकार नहीं था” –
शास्त्रीय रूप से इसे ऐसे समझना ज़्यादा सटीक होगा:
“ब्राह्मणवादी/आर्थिक‑सामाजिक व्यवस्था में वेदाध्ययन और उच्च शिक्षा का अधिकार मुख्यतः उच्च वर्णों तक सीमित कर दिया गया;
शूद्र और अवर्ण/अस्पृश्य समूहों के लिए पढ़ाई पर कड़ी सामाजिक व धार्मिक रोक लगाई गई।”
2. ज़मीनी इतिहास: व्यवहार में क्या हुआ?
चाहे शास्त्र क्या कहें, असली सवाल है – हज़ारों सालों तक समाज में क्या होता रहा?
(क) शिक्षा की संरचना
- शिक्षा का मुख्य केंद्र गुरुकुल, टोल, पंचायत, पाठशाला, मठ आदि थे, जिन्हें प्रायः ब्राह्मण या उच्च जातियों ने चलाया।
- इन जगहों पर प्रवेश के लिए जाति, कुल, धर्म बड़ा कारक था।
- बहुत सारे ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि
- शूद्रों और तथाकथित “अस्पृश्यों” को औपचारिक शिक्षा से लगभग हमेशा बाहर रखा गया।
- जो भी सीखना था, वह प्रायः परिवार/काम के साथ‑साथ व्यावहारिक ज्ञान (कर्मकुशलता) के रूप में मिलता था, न कि पढ़ाई‑लिखाई के रूप में।
(ख) सुधार आंदोलनों का सबूत
अगर ऐतिहासिक तौर पर सब ठीक‑ठाक और “सबको बराबर अधिकार” होता, तो बाद में इतने ज़ोरदार सामाजिक सुधार आंदोलन क्यों उठते?
- जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले – निचली जातियों और लड़कियों के लिए स्कूल खोलने पर उन्हें ज़बर्दस्त विरोध, गालियाँ, पत्थर तक झेलने पड़े।
- नारायण गुरु, पेरियार, डॉ. आंबेडकर, गाँधी (सीमाओं के साथ), आदि शंकराचार्य के बाद के कई संत, भक्ति आंदोलन के संत – ये सब बार‑बार इस असमानता को चुनौती देते रहे।
- डॉ. आंबेडकर खुद लिखते हैं कि उन्हें स्कूल में अस्पृश्य होने के कारण कैसे अपमानित किया जाता था – पानी तक खुद नहीं पी सकते थे, ऊँची जाति का लड़का या चपरासी हाथ से गिलास पकड़ कर पानी पिलाता था।
इतने सारे उदाहरण इस बात के मजबूत संकेत हैं कि:
व्यावहारिक सामाजिक व्यवस्था में, दलितों/शूद्रों की शिक्षा पर भारी सामाजिक‑धार्मिक प्रतिबंध थे
और उसे “प्राकृतिक” या “धार्मिक नियम” कहकर ही जस्टिफाई किया जाता था।
3. “कभी भी पढ़ने का अधिकार नहीं था” – कितना सही/गलत?
यह वाक्य अत्यधिक सलग्न (absolute) है – मतलब “कभी भी, किसी भी समय, कहीं भी नहीं” –
ऐतिहासिक रूप से हम इतना कड़ा वाक्य अक्सर नहीं बोलते, क्योंकि:
-
कुछ अपवाद ज़रूर रहे होंगे –
- किसी राजदरबार में कोई प्रतिभाशाली निम्न जाति व्यक्ति आगे आया,
- कहीं किसी स्थानीय शासक या संत ने समान शिक्षा का रास्ता खोला,
- कहीं‑कहीं व्यापारिक/सूफी/भक्ति परंपराओं में ज़्यादा खुलापन रहा।
-
इसलिए १००% निषेध कहना तकनीकी तौर पर ओवर‑जनरलाइज़ेशन है।
लेकिन:
- बहुसंख्यक दलित/शूद्र जनता के लिए –
व्यवहारिक रूप से स्थिति यही थी कि- उन्हें वेद, शास्त्र, संस्कृत पढ़ने नहीं दिया जाता था,
- आम तौर पर किसी “औपचारिक शिक्षा” की पहुँच से दूर रखा जाता था,
- कोशिश करने पर दंड, सामाजिक बहिष्कार, हिंसा तक के उदाहरण मिलते हैं।
तो अगर आप “फैक्ट‑चेक” के नज़रिए से देखें:
- वाक्य का भाव और मूल आरोप (systemic denial of education):
➤ ऐतिहासिक रूप से काफी हद तक सही है। - उसकी भाषा “कभी भी” और “सभी ब्राह्मणवादी सिर्फ झूठी सफाई देंगे” जैसी बात:
➤ यह राजनीतिक/भावनात्मक भाषा है, सूक्ष्म अकादमिक भाषा नहीं।
➤ इतिहास में ऐसे भी लोग रहे हैं जो ब्राह्मण होते हुए भी इस व्यवस्था के खिलाफ खड़े हुए (जैसे कुछ संत, सुधारक)।
4. आज जो “जस्टिफिकेशन” दिए जाते हैं, वे क्या होते हैं?
“सो‑कॉल्ड हिंदूवादी ब्राह्मणवादी अपनी गलती मानने की बजाय उसे जस्टिफाई करते रहेंगे” –
आम तौर पर कुछ तर्क इस तरह दिए जाते हैं:
-
“वर्ण जाति नहीं, गुण‑कर्म आधारित थी, बाद में बिगड़ गई।”
– आंशिक रूप से सही हो सकता है कि बहुत पुरानी अवस्था अलग रही हो,
– लेकिन हज़ारों सालों के दस्तावेज़, शिलालेख, सामाजिक प्रथाएँ दिखाती हैं कि व्यवहार में यह वंशानुगत जाति बन चुकी थी। -
“ये तो सिर्फ कुछ extreme ग्रंथों में लिखा है, सब ऐसा नहीं कहते।”
– विविधता है, सच है, पर
– जो ग्रंथ “निषेध” लिखते हैं, वे लंबे समय तक मुख्यधारा के “नियम” माने गए,
– और सामाजिक व्यवस्था उन्हीं से बहुत प्रभावित हुई। -
“ब्राह्मणों ने ही सबको शिक्षा दी, गुरुकुल सबके लिए खुले थे।”
– कुछ अपवाद/क्षेत्रों में अधिक समावेशी वातावरण हो सकता है,
– लेकिन व्यापक ऐतिहासिक साक्ष्य (फुले, आंबेडकर, मिशनरी रिपोर्ट्स, औपनिवेशिक सर्वे, लोककथाएँ) दिखाते हैं कि
दलित‑शूद्रों के लिए यह सामान्य हकीकत नहीं थी।
5. निष्कर्ष: “फैक्ट‑चेक” का संतुलित रूप
अगर इसे न्यूज़‑स्टाइल फैक्ट‑चेक की भाषा में कहें तो:
-
क्लेम:
“दलितों और शूद्रों को कभी भी पढ़ने का अधिकार नहीं था।” -
वेरडिक्ट (ज्यादा संतुलित रूप):
- “कभी भी” और “पूर्णत: 100% अपवाद” कहना ओवर‑स्टेटमेंट है,
- लेकिन पारंपरिक वर्ण‑व्यवस्था और उससे प्रेरित सामाजिक ढांचे में
शूद्रों और तथाकथित “अस्पृश्यों” को शिक्षा (खासकर वेद‑शास्त्र और औपचारिक विद्या) से व्यवस्थित रूप से वंचित रखा गया –
यह इतिहास और शास्त्रीय स्रोतों से पुष्ट बात है।
तुक्का नहीं, यह बात बहुत से इतिहासकारों (Romila Thapar, D.D. Kosambi, Gail Omvedt, Kancha Ilaiah Shepherd, आदि) और समाजशास्त्रियों के काम से समर्थन पाती है।
1. कुछ शास्त्रीय स्रोत: शूद्रों/अस्पृश्यों के लिए “शिक्षा निषेध” के सिद्धांत
(क) वेदाध्ययन पर रोक
-
मनुस्मृति (मुख्यतः 2: 115–116, 3: 154, 4: 99, 10: 127)
➤ स्पष्ट करती है कि वेदों को केवल द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) ही पढ़‑सुन सकते हैं।
➤ शूद्र के लिए वेद का श्रवण, पाठ या अध्ययन निषिद्ध है। -
तैत्तिरीय आरण्यक (2.1.3)
➤ “शूद्र को वेद की शिक्षा नहीं देनी चाहिए” – ऐसा सीधा निर्देश।
(ख) दण्ड का प्रावधान
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गौतम धर्मसूत्र (12.4)
➤ यदि शूद्र वेद का अध्ययन करता है, तो राजा को उसके मुँह में पिघला हुआ तेल (या सीसा/टिन) डलवा देना चाहिए। -
वशिष्ठ धर्मसूत्र (23.14)
➤ शूद्र के वेद पढ़ने पर उसे मृत्युदंड दिया जा सकता है।
(ग) “अस्पृश्यों” की स्थिति
-
अपस्तंब धर्मसूत्र (1.3.9–10)
➤ “चांडाल” (तब की एक अस्पृश्य जाति) को गाँव के बाहर बसना चाहिए, हड्डियों की माला पहननी चाहिए,
➤ और “मेरा नाम चांडाल है” कहते हुए घोषणा करते हुए चलना चाहिए,
➤ ताकि कोई “सवर्ण” दूर से ही उनके पास न जाए। -
पराशर स्मृति (4.91)
➤ “चांडाल” को किसी भी शास्त्र का अध्ययन करने का अधिकार नहीं है।
2. आधुनिक संविधान‑काल में शिक्षा से जुड़े दलित‑आंदोलन: एक टाइमलाइन
(क) संविधान से पहले (प्री-1947)
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1848: महात्मा जोतीराव फुले
➤ पुणे में दलित लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला (साथ में सावित्रीबाई फुले ने पढ़ाया)।
➤ ब्राह्मणवादी समाज ने उन्हें जूतों की माला पहनाकर गाँव निकाला दिया, गालियाँ दीं। -
1873: सावित्रीबाई फुले
➤ औरतों और दलितों के लिए 18 स्कूल खोले। -
1882: ज्योतिबा फुले
➤ “सत्यशोधक समाज” की स्थापना की।
➤ विद्यालयों में दलित‑बहुजन बच्चों के प्रवेश के लिए आंदोलन। -
1891: डॉ. बी.आर. आंबेडकर का जन्म
➤ जीवनभर शिक्षा के अधिकार के लिए लड़े, खुद महार जाति से थे। -
1900s: नारायण गुरु (केरल)
➤ एक ब्राह्मण संत, जिन्होंने “अवर्ण” (दलित) बच्चों के लिए स्कूल खोले,
➤ “मानव के लिए शिक्षा” का नारा दिया। -
1919: आंबेडकर की मांग
➤ दक्षिण बोर्ड को प्रार्थना की कि दलित बच्चों के लिए अलग स्कूल खोले जाएँ,
➤ ताकि वे ऊँची जाति के बच्चों के साथ बैठकर पढ़ सकें (अनेक स्थानों पर दलित बच्चों को कक्षा के बाहर बैठकर पढ़ना पड़ता था)। -
1927: महाड़ सत्याग्रह
➤ आंबेडकर ने महाड़ (महाराष्ट्र) में चावड़ तलाव (सार्वजनिक कुआँ) के जल से दलितों को पीने के अधिकार के लिए आंदोलन किया।
➤ इसी आंदोलन में उन्होंने मनुस्मृति की प्रति जलाई। -
1930: नाशिक कालाराम मंदिर सत्याग्रह
➤ दलितों को मंदिर प्रवेश के लिए आंदोलन। -
1932: पुणे पैक्ट
➤ गाँधी जी और आंबेडकर के बीच समझौता –
➤ दलितों को अलग निर्वाचन क्षेत्र न देकर पृथक सीटें देने पर सहमति। -
1942: Dalit Students Federation
➤ मद्रास (चेन्नई) में गठित, दलित विद्यार्थियों के हक़ के लिए।
(ख) संविधान के बाद (पोस्ट‑1947)
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26 जनवरी 1950: भारतीय संविधान लागू
➤ अनुच्छेद 17: छुआछूत का अंत, अपराध घोषित।
➤ अनुच्छेद 46: राज्य की नीति में दलितों/पिछड़ों की शिक्षा‑आर्थिक हितों की रक्षा हो।
➤ अनुच्छेद 15(4): राज्य दलितों के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है। -
1954: Kaka Kalelkar Commission
➤ पिछड़े वर्गों की स्थिति की जाँच – शिक्षा में आरक्षण की सिफारिश। -
1961: First Amendment Act
➤ “अस्पृश्यता” शब्द संविधान में जोड़ा, साथ ही अनुच्छेद 15(2) में सार्वजनिक स्थानों (दुकान, सिनेमा, कुआँ, मंदिर) में भेदभाव निषेध। -
1970s–1980s: Mandal Commission
➤ पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश (1990 में लागू, 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया)। -
1990s: Dalit Literature Movement
➤ दलित लेखकों (उमा भारती, ओमप्रकाश वाल्मीकि, Baby Kamble, आदि) ने अपनी शिक्षा‑संघर्ष की कहानियाँ लिखीं। -
2006: The Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act
➤ हाथ से मैला उठाने की प्रथा गैर‑कानूनी। -
2012: Rohith Vemula की आत्महत्या
➤ हैदराबाद विश्वविद्यालय में एक दलित PhD विद्यार्थी की मौत ने देशव्यापी आंदोलन किया,
➤ शिक्षा में भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न के सवाल उठे। -
2019: 10% EWS Quota
➤ सवर्ण गरीबों के लिए 10% आरक्षण (संविधान के 103वें संशोधन द्वारा)।
(ग) आज भी क्या हो रहा है?
- UGC Regulations (2016): विश्वविद्यालयों को विद्यार्थियों के खिलाफ भेदभाव रोकने के लिए निर्देश।
- National Education Policy 2020: वंचित समूहों के लिए विशेष प्रावधान,
➤ लेकिन इसे लागू करवाने के लिए दलित‑संगठन अब भी लड़ रहे हैं। - Recent Protests:
➤ JNU, BHU, Allahabad University में दलित‑विद्यार्थियों ने हॉस्टल, शुल्क, भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई।
➤ 2023 में भी खबरें आती हैं कि गाँवों में दलित बच्चों को स्कूल में पानी भरने से रोका जाता है।
निष्कर्ष
ये टाइमलाइन दिखाती है कि:
- शास्त्रीय काल से लेकर आज तक, शूद्रों/दलितों को शिक्षा से वंचित रखने के संरचित प्रयास होते रहे हैं।
- संविधान ने कानूनी समानता दी, लेकिन जमीन पर इसका पालन करवाने के लिए लगातार संघर्ष जारी है।
- आज भी “विरासत” इस रूप में दिखती है कि उच्च‑शिक्षा में दलित‑आदिवासी विद्यार्थियों की संख्या अब भी बहुत कम है,
➤ उन्हें अक्सर कक्षा में भेदभाव, छुआछूत की मानसिकता का सामना करना पड़ता है।
इसलिए मूल वाक्य का सार – “सिस्टमेटिक डिनायल ऑफ एजुकेशन” – इतिहास और वर्तमान की किताबों में काफी हद तक सही पकड़ता है।

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