भारतीय इतिहास के पन्नों में पेशवा शासन को अक्सर वीरता और 'हिंदवी स्वराज' के पर्याय के रूप में देखा जाता है। फिल्मों और टीवी सीरियलों ने पेशवा बाजीराव और उनकी बहादुरी की एक ऐसी छवि गढ़ी है, जो हमारी आँखों को चकाचौंध कर देती है। लेकिन, क्या इतिहास सिर्फ युद्ध जीतने और तलवार भांजने तक सीमित है?
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक चर्चा (Thread) छिड़ी है जो पेशवा शासन को "जातिवादी" और "दलित-विरोधी" करार देती है। भीमा-कोरेगांव का युद्ध इसी विमर्श का केंद्र बिंदु है। आज हम भावनाओं से परे हटकर, ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर इस दावे की पड़ताल करेंगे।
1. क्या पेशवा राज में जातिवाद चरम पर था?
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित 'स्वराज' सभी जातियों के लिए था, लेकिन पेशवाओं के दौर में यह 'ब्राह्मणवादी वर्चस्व' में बदल गया।
- ऐतिहासिक तथ्य: यह दावा काफी हद तक सही है। विशेषकर अंतिम पेशवाओं के काल में, सामाजिक नियम बेहद कठोर हो गए थे। पेशवा 'चितपावन ब्राह्मण' थे और उन्होंने शासन चलाने के लिए 'मनुस्मृति' और धर्मशास्त्रों का सहारा लिया।
- प्रमाण: प्रसिद्ध इतिहासकार गोविंद पानसरे अपनी पुस्तक 'शिवाजी कौन थे?' (Shivaji Kon Hota?) में स्पष्ट करते हैं कि शिवाजी की समावेशी नीतियों को पेशवाओं ने पलट दिया था। सत्ता का केंद्र सतारा (छत्रपति) से पुणे (पेशवा) स्थानांतरित हो गया, जिसे आलोचक "राज्य का अपहरण" मानते हैं।
2. दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार: गले में हांडी, कमर पर झाड़ू
यह सुनने में विचलित करने वाला हो सकता है, लेकिन इतिहास की कड़वी सच्चाई यही है।
- सच्चाई: पुणे और पेशवा शासित क्षेत्रों में अछूतों (विशेषकर महार और मांग जाति) पर कठोर प्रतिबंध थे। उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर थूकने की मनाही थी (गले में हांडी) और उनके पैरों के निशान सवर्ण हिंदुओं को अपवित्र न कर दें, इसलिए उन्हें पीछे झाड़ू बांधकर चलना पड़ता था।
- प्रमाण: धनंजय कीर द्वारा लिखित 'डॉ. आंबेडकर: लाइफ एंड मिशन' (पृष्ठ 12-14) में इन प्रतिबंधों का विस्तार से उल्लेख है। अछूतों को शिक्षा और शस्त्र धारण करने के अधिकार से पूरी तरह वंचित रखा गया था।
3. महिलाओं की स्थिति: रूढ़िवाद का गढ़
पेशवा काल में महिलाओं की स्थिति को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जाते हैं।
- विश्लेषण: 18वीं सदी का समाज वैसे भी रूढ़िवादी था, लेकिन पेशवाओं ने इसे राजसी संरक्षण दिया। बाल विवाह को बढ़ावा दिया गया और विधवा पुनर्विवाह को सख्ती से रोका गया। सती प्रथा को महिमामंडित किया गया। यह नियम केवल दलित महिलाओं पर नहीं, बल्कि ब्राह्मण महिलाओं पर भी उतनी ही कठोरता से लागू थे।
- संदर्भ: इतिहासकार उमा चक्रवर्ती अपनी पुस्तक 'जेंडरिंग कास्ट' (Gendering Caste) में बताती हैं कि कैसे पेशवा राज में पितृसत्ता और जाति व्यवस्था ने मिलकर महिलाओं की स्वतंत्रता को कुचल दिया था।
4. अंग्रेजों से संबंध: देशभक्ति या सत्ता का खेल?
एक बड़ा वर्ग मानता है कि पेशवाओं ने अंग्रेजों से कभी समझौता नहीं किया। क्या यह सच है?
- फैक्ट चेक: यह दावा गलत है। पेशवाओं और अंग्रेजों का रिश्ता जटिल था। वे लड़े भी और साथ भी आए।
- बेसीन की संधि (Treaty of Bassein, 1802): जब पेशवा बाजीराव द्वितीय को अपनी गद्दी खतरे में दिखी (होलकर से हारने के बाद), तो वे भागकर अंग्रेजों की शरण में गए और यह अपमानजनक संधि की। इसने मराठा साम्राज्य की स्वतंत्रता को गिरवी रख दिया।
- प्रमाण: इतिहासकार जदुनाथ सरकार की पुस्तक 'फॉल ऑफ द मुगल एम्पायर' (खंड 2) में इसका विस्तृत विवरण मिलता है कि कैसे सत्ता बचाने के लिए अंग्रेजों की मदद ली गई और उन्हें पेंशनभोगी बनना स्वीकार किया।
5. भीमा-कोरेगांव: 500 बनाम 28,000 का सच
1 जनवरी 1818 की भीमा-कोरेगांव की लड़ाई आज दलित स्वाभिमान का प्रतीक है।
- घटनाक्रम: ब्रिटिश सेना की एक छोटी टुकड़ी (बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री), जिसमें लगभग 500-800 सैनिक थे (जिनमें अधिकांश महार थे), ने पेशवा की विशाल सेना को रोके रखा। हालाँकि पेशवा की पूरी 28,000 की सेना ने एक साथ हमला नहीं किया था, लेकिन संख्या बल में भारी अंतर के बावजूद महार सैनिकों का डटे रहना ऐतिहासिक था।
- महत्व: यह लड़ाई केवल अंग्रेजों और मराठों के बीच नहीं थी; यह उन सैनिकों के लिए एक "जातिवादी सत्ता" के खिलाफ विद्रोह था जिसने उन्हें इंसान मानने से इंकार कर दिया था।
- संदर्भ: एलिनोर ज़ेलियट की पुस्तक 'फ्रॉम अनटचेबल टू दलित' (From Untouchable to Dalit) इस घटना के सामाजिक महत्व को रेखांकित करती है।
6. डॉ. आंबेडकर का दृष्टिकोण
बाबा साहेब आंबेडकर ने भीमा-कोरेगांव स्तंभ को दलित शौर्य का प्रतीक माना। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट' (जाति का विनाश) में उन्होंने पेशवा राज की तुलना एक ऐसी तानाशाही से की है जहाँ बहुजनों के लिए कोई स्थान नहीं था। उनके अनुसार, पेशवा राज का अंत दलितों के लिए एक राहत की तरह था।
निष्कर्ष
इतिहास को केवल श्वेत-श्याम (Black and White) में नहीं देखा जा सकता। जहाँ मराठा साम्राज्य भारत के गौरव का हिस्सा है, वहीं पेशवा शासन के अंतिम दौर की सामाजिक कुरीतियाँ, जातिगत भेदभाव और अंग्रेजों के साथ हुए समझौते भी एक अटल सच्चाई हैं।
इतिहास को महिमामंडित करने के बजाय, उससे सीखना ही एक आधुनिक समाज की निशानी है। भीमा-कोरेगांव हमें याद दिलाता है कि जब समाज का एक वर्ग दूसरे को दबाता है, तो राष्ट्र कमजोर होता है।
संदर्भ सूची (References):
- Govind Pansare – Shivaji Kon Hota?
- Dhananjay Keer – Dr. Ambedkar: Life and Mission
- Jadunath Sarkar – Fall of the Mughal Empire
- Sumit Sarkar – Modern India
- Dr. B.R. Ambedkar – Annihilation of Caste



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