हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा एक मौलिक और व्यापक रूप से प्रचलित साधना पद्धति है। किंतु अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या वेदों, जिन्हें हिंदू धर्म का सर्वोच्च और प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है, में इसका कोई विधान या समर्थन है? यह प्रश्न वेदों की व्याख्या और हिंदू धर्म के विकास को लेकर एक गहन बौद्धिक व धार्मिक विमर्श का विषय है। इस लेख में, हम वैदिक संहिताओं, उत्तर-वैदिक ग्रंथों, विभिन्न संप्रदायों के दृष्टिकोण और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इस प्रश्न का तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करेंगे।
वेदों में क्या है? निराकार ब्रह्म की प्रधानता
वैदिक साहित्य (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) मुख्यतः देवताओं की स्तुति के मंत्र और यज्ञ की विधियाँ हैं। प्राचीन वैदिक काल (लगभग 1500–500 ईसा पूर्व) में आराधना का प्रमुख स्वरूप यज्ञ (हवन) था, जहाँ अग्नि में आहुति देकर अग्नि, इंद्र, वरुण, सूर्य आदि प्राकृतिक शक्तियों को प्रसन्न किया जाता था।
- निराकार ईश्वर की अवधारणा: वेदों में ईश्वर की एक अमूर्त, सर्वव्यापी और निराकार अवधारणा प्रबल है।
- ऋग्वेद 1.164.46 में कहा गया है: "एकम् सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" - अर्थात, सत्य एक है, जिसे विद्वान अनेक नामों से पुकारते हैं।
- नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10.129) सृष्टि के आदि कारण को एक गूढ़, अज्ञेय और अमूर्त सत्ता के रूप में वर्णित करता है।
- प्रत्यक्ष मूर्ति-पूजा का अभाव: शास्त्रीय अर्थों में, मूर्ति निर्माण या मंदिरों में प्रतिष्ठा कर पूजन का कोई स्पष्ट और व्यापक विधान वैदिक संहिताओं में नहीं मिलता। पूजा का केंद्रबिंदु यज्ञाग्नि थी।
विवादास्पद संदर्भ: "प्रतिमा" शब्द की व्याख्या
कुछ वैदिक मंत्रों में "प्रतिमा" या "चित्र" जैसे शब्द आते हैं, जिनकी व्याख्या विद्वानों में विवाद का विषय है।
- यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण (6.1.2.12) में "देवतानां प्रतिमा" (देवताओं की प्रतिमा) शब्द का उल्लेख है। कुछ इसे भौतिक मूर्ति मानते हैं, तो कुछ इसे मानसिक ध्यान की प्रतिमा।
- ऋग्वेद के मंत्रों (जैसे 1.164.45, 6.47.18) में "पृथिवी माता, द्यौः पिता" जैसे प्रतीकात्मक उल्लेख हैं।
- पुरुष सूक्त (ऋग्वेद 10.90) सृष्टि की उत्पत्ति को एक विराट पुरुष के रूपक से समझाता है, जो एक दार्शनिक अवधारणा है, न कि मूर्ति का आह्वान।
तथ्य सार: वैदिक धर्म मूलतः एक अमूर्त, प्रकृति-केंद्रित और यज्ञ-प्रधान धर्म था। मूर्ति पूजा जैसी प्रचलित सगुण उपासना का स्पष्ट विधान इसमें नहीं है।
फिर मूर्ति पूजा का विकास कब और कैसे हुआ?
मूर्ति पूजा का सुव्यवस्थित रूप उत्तर-वैदिक काल में, विशेष रूप से पुराणों (300 ईस्वी से आगे) और आगम शास्त्रों के विकास के साथ हुआ।
- पुराण एवं आगम: विष्णु पुराण, शिव पुराण जैसे ग्रंथों और आगम शास्त्रों में मूर्ति के निर्माण, प्राण-प्रतिष्ठा और पूजा-विधि का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन्हें वैदिक परंपरा का ही विकसित रूप माना जाता है।
- महाकाव्यों में संकेत: वाल्मीकि रामायण में शिवलिंग की स्थापना (रामेश्वरम) और महाभारत में कृष्णार्चन के उल्लेख हैं, हालाँकि इन ग्रंथों की रचना वैदिक काल के बाद हुई।
- दार्शनिक आधार: दर्शन ने मूर्ति पूजा को एक साधन के रूप में स्थापित किया। इसे सगुण ब्रह्म (गुणों वाला ईश्वर) की उपासना का एक प्रभावी माध्य्यम माना गया। एक श्लोक कहता है: "आकाशस्थितो देवो ह्यपि मूर्तिः प्रकीर्तिता" (आकाश में स्थित देवता भी मूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित किए जाते हैं)।
दो प्रमुख दृष्टिकोण: विरोध और समर्थन
1. विरोध का पक्ष: "वेदों में मूर्ति पूजा का मना है"
- आर्य समाज: स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने ग्रंथ "सत्यार्थ प्रकाश" में वेदों को एकमात्र प्रमाण मानते हुए मूर्ति पूजा को कड़ाई से अस्वीकार किया। उनका तर्क है कि वेद केवल निराकार, सर्वव्यापी ईश्वर की उपासना सिखाते हैं। आर्य समाज आज भी यज्ञ को ही मुख्य साधना मानता है।
- कुछ इस्लामी/ईसाई विद्वान: हिंदू धर्म की आलोचना में यह तर्क दिया जाता रहा है कि मूर्ति पूजा वैदिक धर्म का हिस्सा नहीं, बल्कि एक बाद की "भ्रष्ट" परंपरा है।
2. समर्थन का पक्ष: "मूर्ति पूजा वैदिक परंपरा का ही विकास है"
- अधिकांश हिंदू सम्प्रदाय: वैष्णव, शैव, शाक्त आदि सम्प्रदाय मूर्ति पूजा को वैध और पूर्ण मानते हैं। उनका मानना है कि हिंदू धर्म केवल वेदों (श्रुति) तक सीमित नहीं, बल्कि पुराण, आगम व स्मृति ग्रंथों से भी विकसित हुआ है।
- दार्शनिक समर्थन:
- अद्वैत वेदांत (शंकराचार्य): मूर्ति पूजा को अपरा विद्या (प्रारंभिक साधना) मानते हैं, जो साधक को अंततः निराकार ब्रह्म (परा विद्या) की ओर ले जाती है।
- भक्ति मार्ग (रामानुज, मध्व): मूर्ति को ईश्वर का सगुण स्वरूप और भक्ति का साक्षात् माध्यम मानते हैं।
एक तुलनात्मक संदर्भ: बौद्ध और जैन धर्म
रोचक तथ्य यह है कि बौद्ध व जैन धर्म, जो प्रारंभ में वैदिक कर्मकांड व मूर्ति पूजा के विरोध में उभरे, समय के साथ स्वयं मूर्ति पूजा के प्रबल केंद्र बन गए। यह उपासना के एक साकार रूप के प्रति मानवीय मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति को दर्शाता है।
संतुलित निष्कर्ष: क्या कहते हैं तथ्य?
| पक्ष | मुख्य तर्क | प्रमुख स्रोत |
|---|---|---|
| विरोधी दृष्टिकोण | वेदों में मूर्ति पूजा का कोई विधान नहीं है। यह बाद की परंपरा है। | ऋग्वेद, आर्य समाज (सत्यार्थ प्रकाश), कुछ पाश्चात्य विद्वान (मैक्स मूलर)। |
| समर्थक दृष्टिकोण | हिंदू धर्म वेदों से आगे विकसित हुआ है। पुराण व आगम मूर्ति पूजा का पूर्ण विधान देते हैं। | विष्णु पुराण, शिव पुराण, आगम शास्त्र, भक्ति साहित्य। |
अंतिम निष्कर्ष:
सन्दर्भ स्रोत:
- ऋग्वेद संहिता (नासदीय सूक्त, पुरुष सूक्त)
- यजुर्वेद: शतपथ ब्राह्मण
- पुराण: विष्णु पुराण, शिव पुराण
- दयानंद सरस्वती: सत्यार्थ प्रकाश
- शंकराचार्य: वेदान्त सूत्र भाष्य
- आधुनिक शोध: एस. राधाकृष्णन, हरमन ओल्डेनबर्ग के कार्य



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