पेशवा, दलित और फुले का वायरल सच: 24 SC/ST राजा? जानें ऐतिहासिक दावों की पूरी सच्चाई

इस सनातनी देश से १२ झूँठ बोले गए है ।

आजकल सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर इतिहास से जुड़े कई मैसेज वायरल होते हैं। ऐसा ही एक मैसेज ब्राह्मण-पेशवा, दलितों और समाज सुधारक ज्योतिराव फुले को लेकर घूम रहा है, जिसमें कई चौंकाने वाले दावे किए गए हैं। लेकिन क्या इन दावों में कोई सच्चाई है?

यह पोस्ट कोई प्रोपेगैंडा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित एक पड़ताल है। आइए, इस वायरल मैसेज के हर दावे की बिंदुवार जाँच करें और सच को जानें।

दावा 1: "ब्राह्मण पेशवा ने 24 SC/ST राजा बनाए और 1857 में उन्होंने गद्दारी की।"

ऐतिहासिक पड़ताल: यह दावा दो बड़े कारणों से पूरी तरह गलत है।

  1. कालानुक्रमिक रूप से असंभव (Incorrect Timeline): पेशवा शासन 1818 में तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद समाप्त हो गया था। अंग्रेजों ने बाजीराव द्वितीय को पेंशन देकर बिठूर भेज दिया। इसलिए, 1857 में कोई "तत्कालीन महाराजा पेशवा" सत्ता में था ही नहीं, जिसके साथ कोई गद्दारी कर सके। 1857 के विद्रोह में नाना साहेब (बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र) एक प्रमुख नेता थे, लेकिन वे शासन नहीं कर रहे थे।
  2. 24 राजाओं की नियुक्ति का कोई प्रमाण नहीं: ऐतिहासिक रिकॉर्ड में ऐसा कोई भी प्रमाण नहीं मिलता कि किसी पेशवा ने 24 अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को राजा बनाया हो। "SC/ST" एक आधुनिक प्रशासनिक वर्गीकरण है, जो 1950 में भारतीय संविधान के लागू होने के बाद आया। इसे 18वीं सदी के समाज पर लागू करना ही अनैतिहासिक है। पेशवा काल में जाति व्यवस्था बहुत कठोर थी और शासन के पद मुख्य रूप से उच्च जातियों तक ही सीमित थे।

निष्कर्ष: यह दावा समय और तथ्य, दोनों के पैमाने पर झूठा है।

दावा 2: "ब्राह्मणों ने दलितों को मंदिर जाने नहीं दिया ❌... सच यह है कि ईसाई पादरियों के प्रभाव में SC वर्ग ने मंदिर तोड़ दिए।"

ऐतिहासिक पड़ताल: यह दावा सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है।

  • मंदिर प्रवेश पर रोक एक ऐतिहासिक सच्चाई है: यह एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत के कई हिस्सों में दलित और अछूत माने जाने वाले समुदायों को लंबे समय तक मंदिरों में प्रवेश से वंचित रखा गया। इसी सामाजिक कुरीति के खिलाफ 20वीं सदी में डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में नासिक का कालाराम मंदिर सत्याग्रह (1930) और दक्षिण भारत में वैकोम सत्याग्रह जैसे बड़े आंदोलन हुए। यह कहना कि ऐसा कभी हुआ ही नहीं, इतिहास को नकारना है।
  • "मंदिर तोड़े" का दावा अतिशयोक्ति है: यह सच है कि औपनिवेशिक काल में कुछ दलित समुदायों ने ईसाई धर्म अपनाया, लेकिन "ज्यादातर लोगों ने अपनी कुलदेवी के मंदिर खुद ही तोड़ डाले" जैसा दावा बिना किसी सबूत के एक बड़ी अतिशयोक्ति है। इसका कोई व्यापक ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है। यह लाइन एक समुदाय पर दोष मढ़ने वाले प्रोपेगैंडा की तरह लगती है।

निष्कर्ष: यह दावा भ्रामक और एकतरफा है, जो स्थापित ऐतिहासिक तथ्यों को झुठलाता है।

दावा 3: "फुले को पेशवा ने 32 एकड़ ज़मीन दान की... हत्या का अपराध खुलने पर बंबई भागे और ब्राह्मण-द्रोही हो गए।"

फुले के बारे में यह कहानी पूरी तरह से मनगढ़ंत, झूठी और मानहानिकारक है


ऐतिहासिक पड़ताल: यह दावा न केवल गलत, बल्कि महान समाज सुधारक ज्योतिराव फुले का अपमान भी है।

  • पेशवा द्वारा भूमि दान असंभव: ज्योतिराव फुले का जन्म 1827 में हुआ था, जबकि पेशवा शासन 1818 में ही समाप्त हो चुका था। तो किसी पेशवा द्वारा उन्हें ज़मीन दान करने का सवाल ही नहीं उठता।
  • हत्या का आरोप झूठा और उल्टा है: ज्योतिराव फुले पर कभी किसी हत्या का आरोप नहीं लगा। इसके विपरीत, उनके सामाजिक सुधार कार्यों (लड़कियों के लिए स्कूल खोलना, दलितों की शिक्षा) से नाराज होकर कुछ रूढ़िवादियों ने 1856 में उनकी हत्या का प्रयास करवाया था। लेकिन जब हत्यारे उनके पास पहुँचे, तो वे फुले के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने खुद ही सच कबूल कर लिया।
  • ब्राह्मणवाद का विरोध वैचारिक था: फुले का जाति-व्यवस्था और ब्राह्मणवाद का विरोध किसी अपराध से बचने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के खिलाफ उनकी गहरी वैचारिक प्रतिबद्धता का परिणाम था। उन्होंने 'गुलामगिरी' जैसी किताबें लिखीं और 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की ताकि दबे-कुचले समाज को सम्मान मिल सके।

निष्कर्ष: फुले के बारे में यह कहानी पूरी तरह से मनगढ़ंत, झूठी और मानहानिकारक है।

अंतिम निष्कर्ष

यह वायरल मैसेज ऐतिहासिक तथ्यों पर खरा नहीं उतरता। यह गलत समय-सीमा, अप्रमाणित दावों और महान हस्तियों पर झूठे आरोपों का एक पुलिंदा है, जिसका मकसद केवल समाज में भ्रम फैलाना है।

इतिहास को व्हाट्सएप फॉरवर्ड से नहीं, बल्कि प्रामाणिक स्रोतों और किताबों से समझना चाहिए। इस तरह के भ्रामक संदेशों को आगे बढ़ाने से पहले हमेशा उनकी सच्चाई की जाँच करें।

भरोसेमंद संदर्भ (Further Reading)

अगर आप सच में इस विषय पर पढ़ना चाहें, तो ये काम आते हैं:

  • Rosalind O’Hanlon, Caste, Conflict and Ideology (फुले और पश्चिमी भारत का सामाजिक इतिहास)
  • Eleanor Zelliot, From Untouchable to Dalit
  • Susan Bayly, Caste, Society and Politics in India
  • (अतिरिक्त संदर्भ) Stewart Gordon, The Marathas 1600–1818 (मराठा/पेशवा काल की पृष्ठभूमि)

अधिक जानकारी और विश्वसनीय अध्ययन के लिए:

  • Rosalind O’Hanlon: "Caste, Conflict and Ideology"
  • Eleanor Zelliot: "From Untouchable to Dalit"
  • Susan Bayly: "Caste, Society and Politics in India"

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