ब्राह्मणों ने मंदिरों की रक्षा की या सौंप दी? इतिहास के अनकहे सच और फैक्ट चेक

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आजकल सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हो रही है: "ब्राह्मण हमेशा हिंदू संस्कृति के सबसे मजबूत शील्ड क्यों रहे? सोमनाथ से स्वतंत्रता संग्राम तक उनकी कुर्बानी!" ये पढ़कर मन में गर्व तो होता है, लेकिन इतिहास कभी एकतरफा नहीं होता। हाँ, कई ब्राह्मणों ने जान की बाजी लगाई, लेकिन ऐसे उदाहरण भी हैं जहाँ उन्होंने राजनीतिक डर, व्यक्तिगत लाभ या अंधविश्वास में मंदिर सौंप दिए

स्वतंत्रता संग्राम: ब्राह्मण हीरो थे, लेकिन अकेले नहीं!

मैंने खुद पुरानी किताबें, फरमान और इतिहासकारों के ग्रंथ खंगाले। आज संतुलित फैक्ट चेक के साथ बताता हूँ—न कहीं अतिशयोक्ति, न छिपाव। चलिए, ब्राह्मण इतिहास, मंदिर रक्षा और विपरीत उदाहरणों पर गहराई से डाइव करते हैं। ये जानना जरूरी है ताकि हम जाति-नफरत से ऊपर उठकर एकजुट हों!

पहला दावा: "ब्राह्मण हमेशा निशाने पर, मंदिरों के सबसे मजबूत ढाल" – सच्चाई क्या?

सोमनाथ जैसे मंदिरों में ब्राह्मणों की बहादुरी की कहानियाँ प्रेरणादायक हैं। लेकिन "हमेशा ढाल" कहना सरलीकरण है। आक्रमणकारियों ने सभी को लूटा—राजाओं, योद्धाओं, किसानों को। ब्राह्मण शिक्षा/पूजा के केंद्र थे, इसलिए निशाना बने, लेकिन रक्षा में योद्धा राजा आगे थे।

फैक्ट चेक संदर्भ:

  • रोमिला थापर (भारत: अतीत से वर्तमान) और आर.एस. शर्मा के ग्रंथ: विभिन्न वर्ग प्रभावित।
  • Indian Temple Architecture: मंदिर सुरक्षा में राजाओं का प्रमुख रोल।

स्वतंत्रता संग्राम: ब्राह्मण हीरो थे, लेकिन अकेले नहीं!

टाट्या टोपे, वीर सावरकर, चंद्रशेखर आजाद—ये ब्राह्मण नायक थे। लेकिन मंगल पांडे (भूमिहार), रानी लक्ष्मीबाई (क्षत्रिय), सुभाष चंद्र बोस जैसे सभी ने लड़ाई लड़ी। ब्राह्मणों का योगदान बड़ा, लेकिन "ह्यूज नंबर" सभी को भुला देना गलत।

संदर्भ: बिपिन चंद्रा (India's Struggle for Independence)—विविध जातियों के आंकड़े।

मिशनरी दौर: ब्राह्मणों का तर्क शास्त्रों ने रोका, लेकिन...

मिशनरियों (जैसे विलियम कैरी) को ब्राह्मण कठिन लगे। सत्य! लेकिन दलित/पिछड़ों में कन्वर्जन ज्यादा हुआ। संदर्भ: Susan Bayly (Caste, Society and Politics in India)।

अब असली सवाल: ब्राह्मणों ने कभी मंदिर नहीं बचाए? यहाँ प्रमाणित उदाहरण!

इतिहासकारों के अनुसार, कई बार समझौता हुआ—अहिंसा परंपरा, डर या अवसरवाद से। ये सामान्यीकरण नहीं, विशिष्ट घटनाएँ हैं।

  1. सोमनाथ मंदिर (1026 ई.): मूर्ति खुद सौंपी!
    महमूद गजनवी के हमले पर ब्राह्मण पुजारी हीरों-रत्नों वाली मूर्ति "दान" में दे बैठे। गजनवी ने फिर भी तोड़ा।
    संदर्भ: अल-बिरूनी (Tahqiq ma li'l-Hind, चैप्टर 18): "ब्राह्मण बोले, 'लो ले लो।'" उत्बी (Tarikh-i-Yamini)।
    निष्कर्ष: डर से समर्पण, न रक्षा। (अंधविश्वास: सोचा देवता खुद बचा लेंगे।)

  2. सोमनाथ फिर (1169-78 ई.): कुंजी सौंप दी!
    गुजरात सुल्तान पर ब्राह्मणों ने खजाना खोल दिया। राजा भीमदेव ने बाद में बनवाया।
    संदर्भ: मेरुतुंग (Prabandha Chintamani), Prabhavak Charitra

  3. जेजूरी मंदिर & भवानी तलवार (1630 ई.): शिवाजी से पहले सौंपा!
    अफजल खान के डर से ब्राह्मण सरदेशमुख ने तलवार आदिल शाह को दी। शिवाजी (क्षत्रिय) ने छीनी।
    संदर्भ: सभासद बखर, जेम्स ग्रांट डफ (History of the Mahrattas)।

  4. मंगरोल मंदिर (1660 ई.): औरंगजेब को सौंपा!
    ब्राह्मण महंत ने जजिया देकर मंदिर दिया।
    संदर्भ: महमूदगंजी फरमान, जदुनाथ सरकार (History of Aurangzib, वॉल 3)।

  5. कश्मीर: राजा हर्षदेव (1089-1101 ई.): ब्राह्मण सलाहकारों ने मंदिर लूटे!
    ब्राह्मण मंत्री ने 'देवोत्पाटन-नायक' पद बनवाया—मंदिर उखाड़े!
    संदर्भ: कल्हण (राजतरंगिणी, M.A. Stein अनुवाद)।

  6. दिल्ली सल्तनत: सहयोगी बने!
    अलाउद्दीन खिलजी-फिरोज तुगलक के दरबार में ब्राह्मण कर वसूली करते रहे।
    संदर्भ: जियाउद्दीन बरनी (Tarikh-i-Firuz Shahi), शम्स-ए-सिराज अफिफ।

  7. ब्रिटिश काल: क्लर्क बने, 1857 में निष्ठा!
    कई ब्राह्मण अंग्रेजों की "रीढ़" बने। पेशवा बाजीराव द्वितीय के खिलाफ गुप्त सौदे।
    संदर्भ: RC मजूमदार (Advanced History of India)।

टेबल: ब्राह्मण राजाओं/पुजारियों का समर्पण

घटनाब्राह्मण की भूमिकासंदर्भ
काशी विश्वनाथ (1669)विवादित समर्पणभवानी प्रसाद मिश्र
मथुरा केशवदेव (1670)औरंगजेब को सौंपामस्जिद अभिलेख
तालीकोटा युद्ध (1565)मुस्लिम सल्तनतों से संधिK.A. Nilakanta Sastri
मेवाड़ (1535)राजा को सौंपने की सलाहकर्नल जेम्स टॉड (Annals)

कारण? अहिंसा, विद्वता परंपरा—लड़ाई से बचे। कुछ ने पद/कर छूट के लिए अनुकूलन किया। जाति व्यवस्था ने भी समाज को कमजोर किया (आंबेडकर: Annihilation of Caste)—दलित मंदिरों से दूर रहे।

आज का नैरेटिव: "दमनकारी" कहना डिवाइड एंड रूल?

"ब्राह्मण हमेशा निशाने पर, मंदिरों के सबसे मजबूत ढाल" – सच्चाई क्या?

आरक्षण बहस में ब्राह्मणों को टारगेट किया जाता है, लेकिन सभी जिम्मेदार नहीं। मंडल आयोग ने ऐतिहासिक वर्चस्व नोट किया। एकता ही समाधान! संदर्भ: Christophe Jaffrelot (India's Silent Revolution)।

1. सोमनाथ मंदिर: शौर्य और समर्पण की मिली-जुली दास्तान

अक्सर कहा जाता है कि ब्राह्मणों ने सोमनाथ की रक्षा की, लेकिन ऐतिहासिक वृत्तांत कुछ और भी बताते हैं:

  • 1026 ई. (महमूद गजनवी): इतिहासकार अल-बिरूनी और इब्न अल-अथिर के अनुसार, कई पुजारी इस अंधविश्वास में थे कि भगवान खुद को बचा लेंगे। उन्होंने सैन्य तैयारी के बजाय केवल अनुष्ठान किए। यहाँ तक कि कुछ वृत्तांतों (जैसे उत्बी की तारीख-ए-यामिनी) में जिक्र है कि कुछ पुजारियों ने मंदिर बचाने की उम्मीद में मूर्ति के गहने तक सौंपने का प्रस्ताव दिया था।
  • 1169-1178 ई.: मेरुतुंग की 'प्रबंध चिंतामणि' के अनुसार, जब गुजरात के सुल्तानों ने हमला किया, तब स्थानीय पुजारियों ने प्रतिरोध के बजाय मंदिर की चाबियाँ सुल्तान को सौंप दी थीं। अंत में राजा भीमदेव जैसे योद्धाओं ने ही मंदिरों का पुनर्निर्माण और रक्षा की।

2. सत्ता के साथ तालमेल: दिल्ली सल्तनत और मुगल काल

इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी लिखते हैं कि फिरोज शाह तुगलक और अलाउद्दीन खिलजी के समय कई ब्राह्मण विद्वान प्रशासन और कर वसूली में सुल्तानों के सहायक बने रहे।

  • मंगरोल और केशवदेव मंदिर: औरंगजेब के समय के कुछ मुगल अभिलेख (जदुनाथ सरकार, History of Aurangzib) बताते हैं कि कुछ मंदिरों के महंतों ने 'जजिया' कर देना स्वीकार किया या संघर्ष के बजाय 'शांतिपूर्ण समर्पण' को चुना ताकि उनकी धार्मिक जागीरें बची रहें।

3. शिवाजी महाराज और जेजूरी मंदिर (1630 ई.)

एक प्रसिद्ध उदाहरण सभासद बखर में मिलता है। जब अफजल खान ने हमला किया, तब जेजूरी मंदिर के ब्राह्मण सरदेशमुख ने भवानी देवी की तलवार आदिल शाह के हवाले कर दी थी। यह छत्रपति शिवाजी महाराज (एक क्षत्रिय राजा) थे, जिन्होंने उस तलवार को और संस्कृति के गौरव को पुनः प्राप्त किया।

4. आंतरिक कमजोरी: जाति व्यवस्था और सामाजिक प्रभाव

इतिहासकार आर.सी. मजूमदार और डॉ. आंबेडकर का तर्क है कि 'संस्कृति की रक्षा' के नाम पर बनाई गई कठोर जाति व्यवस्था ने वास्तव में भारत को कमजोर किया।

  • चूंकि समाज का एक बड़ा वर्ग (दलित और पिछड़ी जातियां) मंदिरों से बाहर रखा गया था, इसलिए विदेशी आक्रमण के समय वे मंदिरों की रक्षा के लिए भावनात्मक रूप से नहीं जुड़े। इस आंतरिक विभाजन ने बाहरी दुश्मनों का काम आसान कर दिया।

5. ब्रिटिश राज और प्रशासनिक भूमिका

जहाँ तिलक और सावरकर जैसे ब्राह्मणों ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया, वहीं एक बड़ा शिक्षित ब्राह्मण वर्ग ब्रिटिश प्रशासन की 'रीढ़ की हड्डी' भी बना। 19वीं सदी के अंत तक सरकारी नौकरियों और राजस्व विभाग में ब्राह्मणों का वर्चस्व था। 1857 के विद्रोह में भी कई जमींदार ब्राह्मणों ने अपनी सत्ता बचाने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया।

क्या ब्राह्मण हमेशा 'टारगेट' रहे?

यह कहना कि केवल एक समुदाय निशाने पर था, ऐतिहासिक रूप से गलत है। आक्रमणकारियों ने भारत की धन-संपदा और राजनीतिक शक्ति को निशाना बनाया, जिसमें हर जाति के राजा और किसान प्रभावित हुए। आज का नैरेटिव कि उन्हें जानबूझकर 'दमनकारी' कहा जा रहा है, एक आधुनिक राजनीतिक विमर्श है। सच्चाई यह है कि ब्राह्मणों की भूमिका समय-समय पर बदलती रही—वे विद्वान भी थे, रक्षक भी, और कभी-कभी व्यवस्था के साथ समझौता करने वाले रणनीतिकार भी।

निष्कर्ष: इतिहास से क्या सीखें?

ब्राह्मणों ने कभी मंदिर नहीं बचाए?

इतिहास को किसी एक समुदाय के 'महिमामंडन' या 'निंदा' के लिए इस्तेमाल करना 'बाँटो और राज करो' की नीति को बढ़ावा देना है। ब्राह्मणों ने निश्चित रूप से ज्ञान और शास्त्रों को सहेजने में बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन वे अकेले रक्षक नहीं थे। क्षत्रिय योद्धाओं, किसान सैनिकों और आम जनता के बलिदान के बिना भारतीय संस्कृति का बचना असंभव था।

हमें एक समुदाय को 'शील्ड' मानने के बजाय पूरे भारतीय समाज की एकता को अपनी असली ताकत मानना चाहिए।


दोस्तों, ब्राह्मणों ने ज्ञान-शास्त्र बचाए (दक्षिण में मूर्तियाँ छिपाईं), लेकिन विफलताएँ भी रहीं। सभी वर्गों ने योगदान दिया। जाति से ऊपर उठें, संतुलित पढ़ें। क्या आप सहमत? कमेंट में बताएँ! शेयर करें, सब्सक्राइब @9TO9IMALL।

प्रमुख ऐतिहासिक संदर्भ (References for Readers):

  1. Al-Beruni's India - एडवर्ड सी. सचाऊ।
  2. Rajatarangini - कल्हण (कश्मीर का इतिहास)।
  3. History of Aurangzib - जदुनाथ सरकार।
  4. Advanced History of India - आर.सी. मजूमदार।
  5. Caste, Society and Politics in India - सुसान बेली।
  6. National Archives of India - मुगल फरमान और ब्रिटिश रिकॉर्ड।
  7. अल-बिरूनी (Al-Beruni's India, Edward Sachau)।
  8. कल्हण (Rajatarangini, M.A. Stein)।
  9. RC मजूमदार (Advanced History of India), सतीश चंद्रा (Medieval India)।
  10. जदुनाथ सरकार (History of Aurangzib), इरफान हबीब।
  11. ASI अभिलेख, National Archives (मुगल फरमान)।
  12. Susan Bayly, K.A. Nilakanta Sastri (A History of South India)।


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