Fact Check: क्या डॉ. अंबेडकर अंग्रेजों के सामने 'म्याऊं-म्याऊं' करते थे? वायरल दावे का सच

इतिहास की कसौटी पर: क्या अंबेडकर वाकई अंग्रेजों से डरते थे?

नमस्ते दोस्तों!

आजकल सोशल मीडिया पर एक बहुत ही तीखा और अपमानजनक मैसेज वायरल हो रहा है। आपने भी शायद इसे व्हाट्सएप या फेसबुक पर देखा होगा। इसमें बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के खिलाफ बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए दावा किया गया है कि उन्होंने "शिक्षा रूपी शेरनी का दूध" तो पिया, लेकिन अंग्रेजों के सामने दहाड़ने के बजाय "म्याऊं-म्याऊं" करते रहे। यहाँ तक कि उन्हें "अंग्रेजों का दल्ला" जैसे शब्दों से संबोधित किया जा रहा है।

जब मैंने इस दावे को पढ़ा, तो एक इतिहास प्रेमी और जागरूक नागरिक होने के नाते मुझे लगा कि इसकी गहराई से पड़ताल करनी चाहिए। क्या वाकई ऐसा था? या यह सिर्फ नफरत फैलाने के लिए गढ़ा गया एक और इंटरनेट झूठ है?

आइये, आज इस पोस्ट में हम भावनाओं से परे हटकर, तथ्यों और सबूतों के आईने में इस दावे का सच जानते हैं।

1. वायरल दावा और उसकी भाषा: एक नज़रिया

सबसे पहले उस दावे पर गौर करते हैं:

“पूछ रहे हैं कि : हे भीमतो तुम्हारा बाप जब शिक्षा नामक शेरनी का दूध पिया तो अंग्रेजों के सामने दहाडने की बजाय म्याऊं-म्याऊं क्यों करता रहा?”

पहली नज़र में ही यह दावा संदिग्ध क्यों लगता है?
अगर आप इस वाक्य की बनावट को देखें, तो यह किसी ऐतिहासिक दस्तावेज का हिस्सा नहीं लगता।

  • 'भीमतो' शब्द: इतिहास की किसी भी किताब या औपचारिक दस्तावेज में डॉ. अंबेडकर के लिए 'भीमतो' शब्द का इस्तेमाल नहीं मिलता। यह आज के दौर का सोशल मीडिया पर इस्तेमाल होने वाला एक अपमानजनक ट्रोल (Troll) शब्द है।
  • 'म्याऊं-म्याऊं': क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि 1930 या 40 के दशक में राजनीतिक बहसों में कोई बिल्ली की आवाज़ (म्याऊं-म्याऊं) का ज़िक्र करेगा? यह भाषा पूरी तरह से आधुनिक 'मीम कल्चर' (Meme culture) की उपज है।
  • 'शिक्षा नामक शेरनी': डॉ. अंबेडकर का एक प्रसिद्ध कथन है- "शिक्षा शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वह दहाड़ेगा।" वायरल पोस्ट ने इसी मशहूर कोट (Quote) को तोड़-मरोड़कर व्यंग्य कसने की कोशिश की है।

निष्कर्ष: यह कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी का 'ज्ञान' है।


2. इतिहास की कसौटी पर: क्या अंबेडकर वाकई अंग्रेजों से डरते थे?

अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर—क्या अंबेडकर अंग्रेजों के समर्थक थे? क्या उन्होंने उनके सामने घुटने टेक दिए थे?

इतिहासकार धनंजय कीर और रामचंद्र गुहा जैसे विद्वानों की मानें तो सच कुछ और ही है।

क) शिक्षा और शेरनी का दूध
यह सच है कि डॉ. अंबेडकर ने अमेरिका (कोलंबिया यूनिवर्सिटी) और लंदन (LSE) से शिक्षा ली। लेकिन यह शिक्षा उन्हें अंग्रेजों की मेहरबानी से नहीं, बल्कि बड़ौदा राज्य (गायकवाड़ महाराज) की स्कॉलरशिप से मिली थी। उन्होंने इस शिक्षा का इस्तेमाल अपनी निजी तरक्की के लिए नहीं, बल्कि भारत लौटकर उस सामाजिक ढांचे को चुनौती देने के लिए किया, जो हजारों सालों से चला आ रहा था।

ख) दहाड़ना किसे कहते हैं?
आलोचक कहते हैं कि उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ "दहाड़ा" नहीं। सच तो यह है कि उन्होंने उस "आंतरिक दुश्मन" के खिलाफ दहाड़ लगाई जो अंग्रेजों से भी ज्यादा खतरनाक था—और वह था जातिवाद और छुआछूत

  • उन्होंने 1936 में "Annihilation of Caste" लिखा, जिसने समाज की नींद उड़ा दी।
  • उन्होंने 1945 में "What Congress and Gandhi Have Done to the Untouchables" लिखकर उस समय की सबसे बड़ी पार्टी (कांग्रेस) की नीतियों को भी चुनौती दी।

क्या यह सब एक डरपोक व्यक्ति कर सकता है?

ग) अंग्रेजों के साथ सहयोग: गद्दारी या रणनीति?
यह सच है कि 1942 से 1946 तक उन्होंने वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम मंत्री के रूप में काम किया। लेकिन इसे "दलाली" कहना इतिहास की नासमझी है।

डॉ. अंबेडकर का मानना था कि सिर्फ अंग्रेजों के चले जाने से दलितों को आजादी नहीं मिलेगी। उन्हें डर था कि सत्ता सिर्फ ऊंची जातियों के हाथ में चली जाएगी। इसलिए, उन्होंने सत्ता में रहकर कानून बदलवाए:

  • कारखाना अधिनियम में सुधार किए।
  • काम के घंटे कम करवाए।
  • दलितों के लिए अलग प्रतिनिधित्व माँगा।

इतिहासकार इसे 'रणनीतिक सहयोग' (Strategic Cooperation) कहते हैं। उनका लक्ष्य अंग्रेजों को खुश करना नहीं, बल्कि वंचितों के अधिकारों को सुरक्षित करना था।


3. 'भारत छोड़ो आंदोलन' और अंबेडकर

अक्सर यह ताना दिया जाता है कि अंबेडकर ने 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' का विरोध किया।
हाँ, उन्होंने किया था। लेकिन क्यों? क्योंकि उन्हें लगता था कि बिना सामाजिक समानता की गारंटी के मिली राजनैतिक आज़ादी दलितों के लिए बेमानी होगी। उन्होंने भावनाओं में बहने के बजाय संविधान और कानून का रास्ता चुना।

और उसका नतीजा क्या हुआ?
आज भारत के पास जो संविधान है, जो समानता और न्याय की बात करता है, वह उन्हीं के संघर्ष की देन है। अगर वो उस वक्त सिर्फ भीड़ के साथ "दहाड़" रहे होते और कूटनीति का प्रयोग न करते, तो शायद आज हाशिए पर खड़े समाज के पास वो अधिकार न होते जो आज हैं।


निष्कर्ष: असली सच क्या है?

दोस्तों, तथ्यों की जांच से यह साफ़ हो जाता है कि:

  1. वायरल दावा काल्पनिक है: "म्याऊं-म्याऊं" और "दल्ला" जैसे शब्द किसी ऐतिहासिक प्रमाण में नहीं मिलते। यह सिर्फ नफरत फैलाने वाला एक इंटरनेट जोक है।
  2. संघर्ष का तरीका अलग था: डॉ. अंबेडकर का तरीका गांधीजी या भगत सिंह से अलग था। वह सड़कों पर लाठी खाने के बजाय संसद और कोर्ट में कलम से लड़ रहे थे।
  3. असली शेर: जिसने सदियों पुरानी सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने की हिम्मत दिखाई, उसे "डरपोक" कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा है।

अगली बार जब आपके पास ऐसा कोई मैसेज आए, तो उसे फॉरवर्ड करने से पहले ज़रा सोचिएगा। इतिहास को सोशल मीडिया के चश्मे से नहीं, किताबों और तथ्यों के चश्मे से देखें।


संदर्भ व स्रोत (References):

  • Annihilation of Caste – B.R. Ambedkar (1936)
  • Dr. Ambedkar: Life and Mission – Dhananjay Keer (1954)
  • India After Gandhi – Ramachandra Guha (2007)
  • पूना समझौता, 1932 (राष्ट्रीय अभिलेखागार)

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