भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी वैचारिक नींव एक ऐसे विद्वान ने रखी थी, जिसे आज हम मुख्य रूप से संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं? डॉ. भीमराव आंबेडकर की 1923 में प्रकाशित शोध थीसिस "The Problem of the Rupee: Its Origin and Its Solution" ने आधुनिक भारत के केंद्रीय बैंक के ढांचे की रूपरेखा तैयार कर दी थी, जब RBI नाम का भी अस्तित्व नहीं था।
यह लेख आपको उस ऐतिहासिक और बौद्धिक सफर के बारे में बताएगा, जिसमें एक थीसिस ने एक आयोग को प्रेरित किया, एक कानून का मार्ग प्रशस्त किया और अंततः 1935 में भारतीय रिज़र्व बैंक को जन्म दिया।
1923: वह थीसिस जिसने इतिहास बदल दिया
डॉ. आंबेडकर की थीसिस कोई सामान्य शैक्षणिक शोध नहीं थी। यह ब्रिटिश भारत की मुद्रा और वित्तीय व्यवस्था की पहली गहन वैज्ञानिक आलोचना थी। इसके चार मुख्य स्तंभ थे:
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गोल्ड एक्सचेंज स्टैंडर्ड की विनाशकारीता: आंबेडकर ने सिद्ध किया कि भारत पर थोपा गया यह मानक हानिकारक था, क्योंकि रुपया सीधे सोने से न जुड़कर पाउंड स्टर्लिंग से जुड़ा था और नियंत्रण लंदन में था। उनका निष्कर्ष था: "This system exposes India to violent currency fluctuations without any internal control."
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मुद्रास्फीति: गरीबों पर छिपा कर: आंकड़ों के साथ उन्होंने दिखाया कि रुपये के अवमूल्यन से कीमतें बढ़ीं, लेकिन वेतन स्थिर रहे, जिससे किसानों-मजदूरों की वास्तविक आय गिरी। उन्होंने लिखा, "मुद्रास्फीति सबसे गरीब वर्गों पर एक छिपा हुआ कर है।"
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सरकारी हाथों में मुद्रा का दुरुपयोग: उन्होंने चेतावनी दी कि जब सरकार के पास नोट छापने की शक्ति होती है, तो वह अपने घाटे का बोझ जनता पर डालती है। इसलिए उनका स्पष्ट मत था: "मुद्रा प्रबंधन को राजकोषीय प्राधिकरण से अलग किया जाना चाहिए।"
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समाधान: एक स्वायत्त केंद्रीय बैंक: यह उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने भारत के लिए एक स्वतंत्र, स्वायत्त केंद्रीय बैंक की स्थापना का आह्वान किया, जो मुद्रास्फीति को नियंत्रित करे, नोट जारी करे और सरकार से अलग होकर काम करे।
1926: हिल्टन यंग कमिशन और आंबेडकर का प्रभाव
आंबेडकर के इस ठोस और अंतरराष्ट्रीय स्तर के आर्थिक विश्लेषण को ब्रिटिश सरकार ने गंभीरता से लिया। 1925-26 में रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस (हिल्टन यंग कमिशन) गठित किया गया।
- ऐतिहासिक भूमिका: डॉ. आंबेडकर को इस कमीशन के समक्ष एक विशेषज्ञ गवाह (Expert Witness) के रूप में बुलाया गया।
- सीधा उद्धरण: कमीशन की रिपोर्ट और कार्यवाही में आंबेडकर की 1923 की थीसिस का बार-बार उद्धरण दिया गया है।
कमीशन की सिफारिशें आंबेडकर के विचारों का सीधा प्रतिबिंब थीं:
| आंबेडकर की थीसिस (1923) | हिल्टन यंग कमिशन रिपोर्ट (1926) |
|---|---|
| स्वायत्त केंद्रीय बैंक की स्थापना | केंद्रीय बैंक की स्थापना की सिफारिश |
| सरकार का मुद्रा प्रबंधन से अलगाव | राजकोषीय व मुद्रा प्राधिकरण के पृथक्करण पर जोर |
| मुद्रास्फीति नियंत्रण व नोट जारी करना | आरक्षित-समर्थित मुद्रा और स्वर्ण-आधारित अनुशासन |
1934-35: कानूनी रूप और RBI का जन्म
हिल्टन यंग कमिशन की सिफारिशों के आधार पर लंबी बहसों के बाद भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 पारित हुआ।
- धारा 3: केंद्रीय बैंक की स्थापना।
- धारा 22: बैंक नोट जारी करने का एकमात्र अधिकार।
- धारा 45: मौद्रिक नियंत्रण की शक्तियाँ।
ये सभी प्रावधान आंबेडकर द्वारा 1923 में प्रस्तावित स्वायत्तता और जवाबदेही के सिद्धांतों पर आधारित थे। अंततः, 1 अप्रैल, 1935 को भारतीय रिज़र्व बैंक अस्तित्व में आया।
RBI का स्वीकार: आधिकारिक मान्यता
यह केवल इतिहासकारों का दृष्टिकोण नहीं है। RBI ने स्वयं अपने आधिकारिक मंचों पर इस योगदान को बार-बार स्वीकार किया है।
- आंबेडकर स्मृति व्याख्यान: RBI द्वारा नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं।
- RBI प्रकाशन: बैंक के विभिन्न प्रकाशनों में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि "डॉ. बी. आर. आंबेडकर के भारतीय मुद्रा समस्या पर कार्य ने भारत के केंद्रीय बैंकिंग ढांचे के लिए बौद्धिक आधार का गठन किया।"
एक संतुलित दृष्टिकोण: यह भी जानना ज़रूरी है
जबकि आंबेडकर का योगदान केंद्रीय और निर्णायक था, RBI की स्थापना एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम थी:
- अन्य प्रभाव: हिल्टन यंग कमिशन पर जॉन मेनार्ड कीन्स जैसे अन्य अर्थशास्त्रियों के विचारों का भी असर था। इससे पहले चैम्पियन कमेटी (1919) ने भी वित्तीय सुधारों की बात की थी।
- ऐतिहासिक संदर्भ: वैश्विक महामंदी (1929) और ब्रिटेन द्वारा स्वर्ण-मानक छोड़ने जैसी घटनाओं ने भारत में एक केंद्रीय बैंक की तत्काल आवश्यकता को बढ़ा दिया था।
- "वैचारिक जनक" बनाम "प्रमुख वास्तुकार": ऐतिहासिक रूप से किसी एक व्यक्ति को संस्था का "जनक" कहना जटिल होता है। एक संतुलित दृष्टिकोण यह है कि डॉ. आंबेडकर RBI के प्रमुख वास्तुकार (Principal Architect) थे, जिनकी बुनियाद पर यह भवन खड़ा हुआ।
✅ अंतिम निष्कर्ष: तथ्यों पर आधारित सत्य
- मूल दावा सही है: डॉ. आंबेडकर का मौद्रिक विश्लेषण RBI के गठन की बौद्धिक नींव का एक प्रमाणित एवं महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- ऐतिहासिक कड़ी स्पष्ट: 1923 (थीसिस) → 1926 (हिल्टन यंग कमिशन) → 1934 (RBI अधिनियम) → 1935 (RBI स्थापना) का क्रम ऐतिहासिक रूप से दर्ज है।
- आधिकारिक मान्यता: RBI और प्रामाणिक इतिहास इस योगदान को स्वीकार करते हैं।
निष्कर्षत: यह कोई मिथक नहीं, बल्कि तथ्यों और दस्तावेजों पर आधारित इतिहास है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने न सिर्फ भारत के संविधान, बल्कि उसकी आर्थिक संप्रभुता की रीढ़ की नींव रखने में अमिट योगदान दिया। उनकी दूरदृष्टि ने एक ऐसी संस्था का ब्लूप्रिंट तैयार किया जो आज भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिरता और दिशा प्रदान करती है।
मुख्य संदर्भ स्रोत:
- Ambedkar, B. R. (1923). The Problem of the Rupee: Its Origin and Its Solution.
- Report of the Royal Commission on Indian Currency and Finance (Hilton-Young Commission), 1926.
- The Reserve Bank of India Act, 1934.
- Reserve Bank of India. (1970). History of the Reserve Bank of India (1935-1951), Vol. 1.
- Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. 6.



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