एक बौद्धिक संघर्ष का परिणाम
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) का निर्माण महज़ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था; यह दशकों तक चले गहन आर्थिक विचार-विमर्श और बौद्धिक संघर्ष का परिणाम था। हालाँकि भारत की स्वतंत्रता के बाद के प्रतीकात्मक नेतृत्व में विभिन्न नेताओं का योगदान रहा है, लेकिन RBI की संरचनात्मक और वैचारिक नींव सीधे तौर पर डॉ. भीमराव आंबेडकर के आर्थिक विश्लेषण से जुड़ी है।
यह लेख डॉ. आंबेडकर के मौलिक कार्य से लेकर RBI की स्थापना तक की ऐतिहासिक कड़ी का विस्तृत तथ्यात्मक सत्यापन प्रस्तुत करता है।
1. मौलिक आधार: डॉ. आंबेडकर की थीसिस (1923)
डॉ. बी.आर. आंबेडकर द्वारा 1923 में प्रस्तुत की गई शोध "The Problem of the Rupee: Its Origin and Its Solution" केवल एक अकादमिक प्रबंध नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश भारत की मुद्रा और वित्त व्यवस्था की पहली वैज्ञानिक आलोचना थी।
आंबेडकर ने इस थीसिस के माध्यम से केंद्रीय बैंक की अनिवार्यता के ठोस तर्क प्रस्तुत किए, जिनके चार मुख्य स्तंभ थे:
(A) गोल्ड एक्सचेंज स्टैंडर्ड की विनाशकारी प्रकृति
ब्रिटिश सरकार ने भारत पर गोल्ड एक्सचेंज स्टैंडर्ड थोपा था, जहाँ रुपया सीधे सोने से नहीं, बल्कि पाउंड स्टर्लिंग से जुड़ा था, जिससे नियंत्रण लंदन में रहता था।
- आंबेडकर का निष्कर्ष: "यह प्रणाली भारत को आंतरिक नियंत्रण के बिना मुद्रा में हिंसक उतार-चढ़ाव के अधीन करती है।"
संदर्भ: Ambedkar, The Problem of the Rupee, Chapter IV
(B) मुद्रास्फीति (Inflation) और आम जनता पर बोझ
आँकड़ों का उपयोग करते हुए, उन्होंने सिद्ध किया कि रुपये के अवमूल्यन से कीमतें बढ़ीं, जबकि वेतन स्थिर रहे, जिससे श्रमिक और किसान वर्ग की वास्तविक आय गिरी।
- निष्कर्ष: "मुद्रास्फीति सबसे गरीब वर्गों पर एक छिपा हुआ कर है।"
संदर्भ: Chapter V–VI
(C) राजनीतिक दुरुपयोग का जोखिम
आंबेडकर ने चेतावनी दी कि मुद्रा छापने की शक्ति यदि राजकोषीय प्राधिकरण (Fiscal Authority) के हाथों में रहती है, तो सरकार अपने घाटे का बोझ जनता पर डालेगी।
- निष्कर्ष: "मुद्रा प्रबंधन को राजकोषीय प्राधिकरण से अलग किया जाना चाहिए।"
संदर्भ: Chapter VII
(D) समाधान: स्वायत्त केंद्रीय बैंक की मांग
आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से उस मॉडल की रूपरेखा तैयार की जो भविष्य में RBI बना: एक ऐसा केंद्रीय बैंक जो सरकार से स्वतंत्र (Autonomous) हो, मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करे, और मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करे।
संदर्भ: Chapter VIII–IX
2. बौद्धिक रूपांतरण: हिल्टन यंग कमिशन (1925–26)
आंबेडकर के विश्लेषण की गहनता और आर्थिक भाषा के कारण, ब्रिटिश सरकार ने इसे गंभीरता से लिया। इसके परिणामस्वरूप 1925-26 में रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस (हिल्टन यंग कमिशन) का गठन हुआ।
आंबेडकर की विशेषज्ञ भूमिका
डॉ. आंबेडकर को इस कमीशन के समक्ष विशेषज्ञ गवाह (Expert Witness) के रूप में बुलाया गया था। कमीशन की रिपोर्ट में उनकी 1923 की थीसिस का बार-बार उद्धरण (citation) किया गया।
ऐतिहासिक साक्ष्य: कमीशन की रिपोर्ट में मुद्रा स्थिरता और केंद्रीय बैंकिंग पर दिए गए सुझाव, डॉ. आंबेडकर के तर्कों का सीधा प्रतिबिंब थे।
- संतुलित दृष्टिकोण: हालाँकि आंबेडकर का प्रभाव निर्णायक था, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कमीशन की सिफारिशें केवल उन्हीं के विचारों पर आधारित नहीं थीं। इस पर जॉन मेनार्ड कीन्स जैसे अन्य सदस्यों और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों (जैसे महामंदी) का भी प्रभाव था।
संदर्भ: Report of the Royal Commission, 1926 (Sections on Currency Stability & Central Banking)
3. कानूनी ढांचा: RBI अधिनियम, 1934
हिल्टन यंग कमिशन की सिफारिशों ने केंद्रीय बैंक की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया, जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के रूप में कानूनी जामा पहनाया गया।
| डॉ. आंबेडकर (1923) की मांग | RBI अधिनियम, 1934 की कानूनी प्रावधान |
|---|---|
| स्वायत्त केंद्रीय बैंक | धारा 3: केंद्रीय बैंक की स्थापना |
| मुद्रा प्रबंधन का अलगाव | धारा 45: मौद्रिक नियंत्रण की शक्ति |
| नोट जारी करने का एकाधिकार | धारा 22: नोट जारी करने का एकमात्र अधिकार |
ये सभी प्रावधान सीधे तौर पर उस स्वायत्तता और नियंत्रण की मांग को पूरा करते हैं जो आंबेडकर ने एक दशक पहले रखी थी।
संदर्भ: The Reserve Bank of India Act, 1934 और Ambedkar Writings & Speeches, Vol. 6
4. RBI द्वारा मान्यता और विरासत
यह अकादमिक बहस का विषय मात्र नहीं है, बल्कि RBI ने स्वयं अपने आधिकारिक रिकॉर्ड्स में इस बौद्धिक योगदान को स्वीकार किया है।
RBI के प्रकाशनों और डॉ. आंबेडकर स्मृति व्याख्यानों (Ambedkar Memorial Lectures) में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि:
“डॉ. बी. आर. आंबेडकर के भारतीय मुद्रा समस्या पर किए गए कार्य ने भारत की केंद्रीय बैंकिंग रूपरेखा के लिए बौद्धिक आधार का गठन किया।”
संदर्भ: RBI Publications Division
निष्कर्ष: कालानुक्रमिक प्रमाण
RBI की स्थापना की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से निम्नलिखित चरणों में प्रमाणित होती है:
- 1923: आंबेडकर द्वारा थीसिस के माध्यम से सैद्धांतिक आधार की स्थापना।
- 1926: हिल्टन यंग कमिशन द्वारा इसी आधार पर रिपोर्ट तैयार करना।
- 1934: RBI अधिनियम द्वारा कानूनी मान्यता।
- 1935: RBI का परिचालन आरंभ।
निष्कर्षतः, डॉ. भीमराव आंबेडकर भारतीय रिज़र्व बैंक के वैचारिक वास्तुकार थे। उनका विश्लेषण आज भी आधुनिक केंद्रीय बैंकिंग सिद्धांतों का आधार है।
मुख्य संदर्भ (Major References)
- B. R. Ambedkar – The Problem of the Rupee: Its Origin and Its Solution (1923)
- Royal Commission on Indian Currency & Finance Report (1926)
- RBI – History of the Reserve Bank of India
- Ambedkar Writings & Speeches, Vol. 6



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